national-research-canter-on-camel

PRESS RELEASE

 

 

राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्‍द्र, बीकानेरने मनाया ‘जयकिसान – जय विज्ञान’ सप्ताह

राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्‍द्र, बीकानेर ने दिनांक 23 दिसम्बर से 29 दिसम्बर 2016 तक ‘जयकिसान – जय विज्ञान’  सप्ताह मनाया। इस सप्‍ताह के तहत केन्‍द्र के विषय विशेषज्ञ वैज्ञानिको द्वारा 25 किसानों को उष्ट्र पालन एवं उष्ट्र दुग्ध व्यवसाय पर (26-28 दिसम्बर के दौरान) तीन दिवसीय प्रशिक्षण (आर. आर. के. वी. आई. परियोजना द्वारा वित्त पोषित) दिया गया। साथ ही स्थानीय डूंगर महाविद्यालय,बीकानेर के विज्ञान विषय से जुड़े करीब 25 छात्रों को केन्‍द्र में शैक्षणिक भ्रमण करवाते हुए उन्‍हें उष्ट्र पालन व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए केन्‍द्र द्वारा किए जा रहे सतत प्रयासों की जानकारी भी दी गई। दिनांक 29 दिसम्‍बर कोसवाई माधोपुर से आये 50 किसानों को भी केन्‍द्र का भ्रमण कराया गया तथा किसानों को उष्ट्र पालन एवं उष्ट्र दुग्ध प्रसंस्करण व विपणन के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया। उन्‍हें उष्ट्र पालन से जुड़ी विभिन्‍न व्यवसायिक गतिविधियां जैसे कैमल से जुड़े ईकोटूरीज्म, कैमल मिल्क प्रसंस्करण, इसके विपणन आदि के बारे में महत्‍वपूर्ण जानकारी दी गई। इन किसानों ने भविष्य में केंद्र का पुन: भ्रमण कर कैमल मिल्क प्रसंस्करण का विस्तृतप्रशिक्षण लेनेकीमंशा व्‍यक्‍त की। 29 दिसम्‍बर कोसप्‍ताह के समापन समारोह के अवसर पर उष्ट्र पालन पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमे श्री गोवर्धन राईका (राज्य मंत्री), अध्यक्ष, पशुपालक कल्याण बोर्ड, राजस्थान सरकार, श्री देबु राम जी राईका, सदस्य,  राजस्थान पशुपालन विकास बोर्ड, श्री जगमाल जी राईका, प्रगतिशील पशुपालकव समाजसेवी की भागीदारिता रही। केंद्र निदेशक डॉ. एन. वी. पाटिल ने ऊँट एवं ऊँट पालकों के लिए केंद्र द्वारा किये जा रहे अनुसन्धान एवं प्रसार गतिविधियों की संक्षिप्त में जानकारी दी। इस अवसर पर प्रदेश के विभिन्‍न क्षेत्रों से आए ऊँट पालकों ने ऊँट पालनव्‍यवसाय में आ रही समस्याओं से अवगत कराया। परिचर्चा में राज्यऔर देश मेंऊँटों की घटती संख्या पर चिंता जाहिर की गई और ऊँटो के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए जरुरी उपायों पर गहन चिंतन किया गया। श्री गोवर्धन राईका ने यह भरोसा दिलाया कि ऊँट पालकों की समस्याओं के निराकरण तथा उनके कल्‍याणार्थ राज्य सरकार के समक्ष ठोस कार्यक्रम रखेंगे तथा राज्‍य में संभाग स्‍तर पर ऊँटनी के दूध के वितरण हेतु दूध संग्रहण केन्‍द्र खोलने का प्रस्‍ताव सरकार के समक्ष प्रस्‍तुत करेंगे साथ ही उन पर शीघ्र अमल हो सके, इसके लिए भरसक प्रयास करेंगे। उन्‍होंने बताया कि एनआरसीसी के प्रयासों से जो एफएसएसएआई द्वारा ऊँटनी के दूध को मान्‍यता दी गई है, को श्रीमती वसुन्‍धरा राजे, माननीया मुख्‍य मंत्री -राजस्‍थान सरकार द्वारा सराहा गया है। इस अवसर पर उत्कृष्ट अनुसंधान एंव प्रसार कार्यों के लिए केन्‍द्र के तीन वैज्ञानिकों - डॉ. आर. के. सावल, डॉ. राघवेन्द्र सिंह एवं डॉ. एस. सी. मेहता को सम्‍मानित किया गया।

 

 

कृषि शिक्षा दिवस का आयोजन

भाकृअनुप – राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसन्धान केंद्र, बीकानेर द्वारा कृषि शिक्षा दिवस का आयोजन दिनांक 3 दिसम्बर 2016 को राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, मोतीगढ़, तहसील खाजूवाला, जिला बीकानेर (राजस्थान)में किया गया|इस कार्यक्रम में केंद्र के वैज्ञानिकों,विद्यालय के लगभग 100 बच्चों, अध्यापकों एवं कर्मचारियों ने भाग लिया|विद्यालय के बच्चों को कृषि, पशु पालन, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण इत्यादि के पाठ्यक्रमों की व् रोजगार सम्बंधित जानकारी दी गई | पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त मरू क्षेत्र में कृषि एवं पशु पालन से जुड़े रोजगार की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई | बच्चों को राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कृषि योजनाओं से भी अवगत कराया गया | कृषि शिक्षा दिवस का आयोजन डॉ.एफ.सी.टुटेजा, डॉ.राकेश रंजन, डॉ. शिरीश नारनावरे व संचालन डॉ.आर. के. सावल द्वारा किया गया |

 
  

स्‍वच्‍छता पखवाड़ा
(16 अक्‍टूबर से 31 अक्‍टूबर, 2016)
स्‍वच्‍छता पखवाड़ा शुभारम्‍भ : 17.10.2016


स्‍वच्‍छ भारत अभियान कार्यक्रम के दिनांक 17.10.2016 को प्रात: 10.30 बजे शुभारम्‍भ के अवसर पर केन्‍द्र निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल के नेतृत्‍व में सभी वैज्ञानिकों, अधिकारियों, कर्मचारियों को ‘स्‍वच्छता शपथ’ दिलाई गई। डॉ.पाटिल ने ‘’स्‍वच्‍छ भारत’’ के तहत 16 अक्‍टूबर से 31 अक्‍टूबर, 2016 तक आयोज्‍य ‘स्‍वच्‍छता पखवाड़ा’ में स्‍वच्‍छता के महत्‍व के प्रति सभी का ध्‍यान आकर्षित करते हुए इसमें केन्‍द्र के योगदान एवं केन्‍द्र में साफ-सफाई कार्यक्रम की सफलता हेतु सभी से सहयोग की अपील की।


Description: E:\Swchhach pakhwara 16\DSC02961.jpg


स्‍वच्‍छता के प्रति विद्यार्थियों में जागरूकता लाने तथा इस हेतु उन्‍हें प्रेरित करने के प्रयोजनार्थ केन्‍द्र द्वारा अपने निर्धारित कार्यक्रम अनुसार दिनांक 18.10.2016 को प्रात 7.30 बजे शिक्षा हाई स्‍कूल, बीकानेर में चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें कक्षा 3 से 8 वीं तक के 50 विद्यार्थियों ने अपनी सक्रिय भागीदारिता निभाई। प्रतियोगिता से पूर्व केन्‍द्र द्वारा अपने स्‍वच्‍छता पखवाड़ा कार्यक्रम की जानकारी देते हुए उन्‍हें अपने आस-पास के परिवेश को स्‍वच्‍छ बनाए रखने तथा गंदगी नहीं फैलाते हुए एक स्‍वच्‍छ एवं स्‍वस्‍थ देश के रूप में भारत राष्‍ट्र को अग्रसर बनाने हेतु प्रेरित किया गया।  विद्यार्थियों हेतु आयोजित इस चित्रकला प्रतियोगिता हेतु श्री अरूण यादव, प्राचार्य, शिक्षा हाई स्‍कूल ने केन्‍द्र निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल एवं उनके कार्मिकों की इस रचनात्‍मक गतिविधि की प्रशंसा करते हुए केन्‍द्र द्वारा इसे विद्यालय स्‍तर पर भी आयोजित करना सार्थक बताया।  

Description: E:\Swchhach pakhwara 16\JPG (1).jpg

स्‍वच्‍छता के प्रति जागरूकता हेतु चित्रकला प्रतियोगिता : 18.10.2016

 

हिन्‍दी पखवाड़ा-2016 का कार्यवृत्‍त


हिन्दी दिवस एवं हिन्‍दी पखवाड़ा मनाए जाने के संबंध में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्‍ली से प्राप्‍त पत्रांक 10(1)/2015-हिन्‍दी दिनांक 4 अगस्‍त, 2016 की अनुपालना में भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर में दिनांक 01-15 सितम्‍बर, 16 तक हिन्‍दी पखवाड़ा मनाया गया। पत्र में निहित दिशा-निर्देशों की अनुपालना तथा केन्‍द्र में राजभाषा के उत्‍तरोत्‍तर प्रयोग हेतु मनाए गए इस पखवाड़े की अवधि के दौरान राजभाषा संबंधी विभिन्‍न गतिविधियां व कार्यक्रम आयोजित किए गए । केन्‍द्र के  वैज्ञानिकों/अधिकारियों/कर्मचारियों  ने सक्रिय भागीदारिता निभाते हुए हिन्‍दी पखवाड़ा-2016 को सफल बनाया ।


हिन्‍दी पखवाड़ा :  उद्घाटन कार्यक्रम – 01.09.2016  


केन्‍द्र में दिनांक  01 सितम्‍बर, 2016  को  हिन्दी पखवाड़े का विधिवत् शुभारम्भ हुआ । इस अवसर पर केन्‍द्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम अध्‍यक्ष डॉ. राजेश कुमार सावल ने कहा कि हिन्‍दी भाषा में विद्यमान अनेकानेक विशेषताओं  के  रहते  हमें इस भाषा पर गर्वित होना चाहिए । उन्‍होंने केन्‍द्र के हितार्थ एवं प्रयोजनार्थ ऊँट पालकों व किसानों के साथ आपसी संवाद का जरिया हिन्‍दी भाषा को बताया । डॉ. सावल ने वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अपने अपने कार्यक्षेत्र में राजभाषा के अधिकाधिक प्रयोग हेतु प्रोत्‍साहित किया ।
इस अवसर पर प्रभारी राजभाषा डॉ. सुमन्‍त व्‍यास ने हिन्दी दिवस मनाए जाने की परंपरा पर प्रकाश डाला तथा केन्‍द्र की राजभाषा प्रगति को सदन के समक्ष रखते हुए पूरे पखवाड़े (01-15 सितम्बर) की गतिविधियों में सभी की सहभागिता हेतु अनुरोध किया । हिन्‍दी पखवाड़े के इस शुभ अवसर पर श्रीमान राधा मोहन सिंह,  माननीय कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्री,  भारत सरकार द्वारा हिन्‍दी दिवस, 2016 पर जारी संदेश का वाचन किया गया ।


हिन्दी सामान्‍य ज्ञान प्रश्‍नोत्‍तरी प्रतियोगिता


दिनांक 01.09.2016 को हिन्‍दी पखवाड़े के उद्घाटन सत्र के पश्चात् ही हिन्दी के सामान्‍य ज्ञान पर आधारित प्रश्‍नोत्‍तरी प्रतियोगिता आयोजित की गई ।  वस्‍तुनिष्‍ठ प्रश्‍नों पर आधारित इस प्रतियोगिता में सभी प्रतिभागियों ने गहरी रूचि प्रदर्शित की । इस प्रतियोगिता में प्रथम स्‍थान पर डॉ. बलदेव दास किराडू,  द्वितीय स्‍थान पर संयुक्‍त रूप से श्री भरत कुमार आचार्य एवं श्री अशोक यादव तथा तृतीय स्‍थान पर संयुक्‍त रूप से डॉ. आर.के. सावल एवं श्री राकेश पूनियां  रहे ।  डॉ. राकेश रंजन, श्री महेन्‍द्र कुमार राव (अ वर्ग में),  श्री हरपाल सिंह, श्री राधाकृष्‍ण (ब वर्ग में) तथा श्री सुखदेव प्रजापति (स वर्ग में) को प्रोत्‍साहन पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ ।
Description: DSC02055
हिन्‍दी सामान्‍य ज्ञान प्रश्‍नोत्‍तरी परीक्षा


हिन्‍दी में टिप्‍पणी एवं प्रारूप लेखन प्रतियोगिता

कार्यालय के  कामकाज  में  राजभाषा प्रयोग की ओर अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रोत्‍साहित करने  एवं उनकी कार्यक्षमता में अभिवृद्धि के  उद्देश्‍य को ध्‍यान में रखते हुए दिनांक 05.09.2016 को हिन्‍दी में टिप्‍पणी एवं प्रारूप लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें प्रतिभागियों ने उत्‍साहपूर्वक भाग लिया । इस प्रतियोगिता में श्री राम दयाल पहले स्‍थान पर रहे, दूसरे स्‍थान पर डॉ. राकेश रंजन तथा तीसरे स्‍थान पर डॉ. बलदेव दास किराडू रहे । वहीं (अ वर्ग में) डॉ.संजय कुमार, (ब वर्ग में) श्री हरपाल सिंह तथा श्री अनिल कुमार तथा (स वर्ग में) श्री राजेश कुमार को प्रोत्‍साहन पुरस्‍कार प्रदान किए गए ।


हिन्‍दी में शुद्ध लेखन प्रतियोगिता

हिन्दी पखवाड़े के अन्तर्गत ही दिनांक 07.09.2016 को हिन्दी में शुद्ध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता के माध्‍यम से कार्यालय में दैनंदिन प्रयुक्‍त हिन्‍दी शब्‍दों के शुद्धिकरण की ओर प्रतिभागियों का ध्‍यान खींचा गया जिसमें डॉ.बलदेव दास किराडू़ ने प्रथम, श्री हरपाल सिंह द्वितीय, श्री रामदयाल व श्री सुखदेव संयुक्‍त रूप से तृतीय स्‍थान पर रहे । प्रोत्‍साहन  पुरस्‍कार श्री दिनेश मुंजाल(अ वर्ग), श्री रामेश्‍वर लाल व्‍यास(ब वर्ग) तथा डॉ. राकेश कुमार पूनियां (स वर्ग) को प्राप्‍त हुए । 


हिन्‍दी में निबन्‍ध लेखन प्रतियोगिता

केन्‍द्र के कार्यक्षेत्र से संबद्ध वि‍षय  ‘ऊँट  पालन - कल, आज और कल’ पर  दिनांक 07.09.2016  को  हिन्दी में निबंध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । इस प्रतियोगिता में श्री दिनेश मुंजाल ने प्रथम, डॉ.राकेश रंजन ने द्वितीय  तथा डॉ.बलदेव दास किराडू ने तृतीय स्‍थान अर्जित किया वहीं प्रोत्‍साहन स्‍वरूप डॉ.काशी नाथ (अ वर्ग), श्री हरपाल सिंह (ब वर्ग)  तथा श्री राजेश कुमार (स वर्ग)  ने पुरस्‍कार जीते । 


Description: DSC02068
हिन्‍दी निबन्‍ध लेखन की परीक्षा देते प्रतिभागी


हिन्दी पखवाड़ा : मुख्य समारोह


हिन्‍दी पखवाड़ा-2016 का मुख्‍य समारोह 14 सितम्बर 2016  को मनाया गया जिसमें मुख्य अतिथि,  डॉ.मदन केवलिया, वरिष्ठ साहित्यकार, बीकानेर ने अपने अभिभाषण में बताया कि हिन्दी, अमीर खुसरो के समय से होते हुए स्वतंत्रता आंदोलन के समय सम्पर्क सूत्र के रूप में उभरी थी, अतः 14 सितम्बर-हिन्दी दिवस असल में हिन्दी दिवस न होकर राजभाषा दिवस के रूप में मनाया जाए, हिन्दी अपनी विशेषताओं के कारण कमाल की भाषा है और देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता को सभी ने स्वीकारा है । डॉ.केवलिया ने कहा कि आज अति आधुनिक युग में भी हिन्दी ने सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, बाजारवाद आदि सभी क्षेत्रों में चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया है । अत:  हमें हिन्दी के शुद्धिकरण, सरलता एवं व्यावहारिक अनुवाद की ओर भी ध्यान देना होगा तभी हिन्दी भाषा सही एवं तीव्र प्रसार पा सकेंगी ।


Description: DSC02106
मुख्‍य अतिथि डॉ. केवलिया मुख्‍य समारोह में बोलते


इस अवसर पर श्री राजनाथ सिंह, माननीय गृहमंत्री, भारत की ओर से हिन्दी दिवस-2016 के उपलक्ष्य पर जारी संदेश का वाचन भी किया गया ।
मुख्‍य समारोह  में केन्‍द्र निदेशक  एवं कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ.एन.वी.पाटिल ने हिन्दी भाषा को धरोहर के रूप में मानते हुए इसे प्रबल रूप से आगे लाने हेतु सदन में उपस्थित कार्मिकों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि  यह सबको जोड़ने वाली भाषा है और इस भाषा के विकास हेतु हमें यर्थाथ में प्रयास करने होंगे तो हिन्दी दिवस आदि मनाने की भी सच्चे स्वरूप में सार्थकता सिद्ध होगी । डॉ.पाटिल ने इस अवसर पर सुनाए गए माननीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह के संदेश का हवाला देते हुए कहा कि अब हर जगह हर क्षेत्र में हिन्दी को अपनाना होगा क्योंकि अब हिन्दी समझने व समझाने में किसी प्रकार की बाधा नहीं है ।  डॉ.पाटिल ने भाषा में सरलता को अपनाएं जाने की भी बात कही।


Description: DSC02137
मुख्‍य समारोह में अपना अभिभाषण प्रस्‍तुत करते हुए डॉ.पाटिल


इस अवसर पर बीकानेर नगर के हास्य कवि श्री विजय कुमार धमीजा ने कविता पाठ किया। वहीं प्रभारी राजभाषा डॉ.सुमन्त व्यास ने राजभाषा कार्यान्वयन व हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत आयोजित प्रतियोगिताओं के बारे में जानकारी दी ।


Description: DSC02099
कवि श्री धमीजा अपनी रचनाओं की प्रस्‍तुति करते हुए

मुख्य अतिथि एवं मंचस्थ जनों के कर कमलों से केन्द्र द्वारा हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत आयोजित हिन्दी में निबन्ध लेखन, हिन्दी सामान्य ज्ञान, टिप्पणी एवं प्रारूप लेखन एवं हिन्दी में शुद्ध लेखन प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार वितरित किए । कार्यक्रम का संचालन श्री हरपाल सिंह ने किया ।


Description: DSC02117Description: DSC02129
मुख्‍य समारोह में विजेताओं को पुरस्‍कृत करते हुए अतिथि गण


राजभाषा कार्यशाला एवं हिन्‍दी पखवाड़ा समापन कार्यक्रम


दिनांक 15.09.16  को  हिन्‍दी  पखवाड़े के समापन कार्यक्रम से पूर्व कम्‍प्‍यूटर के माध्‍यम से  हिन्‍दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए  ‘कम्प्यूटर पर हिन्दी प्रयोग‘  विषयक राजभाषा कार्यशाला का आयोजन किया गया । कार्यशाला सत्र से पूर्व सर्वप्रथम  प्रभारी राजभाषा डॉ.सुमन्त व्यास ने राजभाषा कार्यशाला के उद्देश्‍य व महत्व पर प्रकाश  डाला ।
व्‍याख्‍यान सत्र में  अतिथि वक्ता श्री अनिल कुमार शर्मा, सचिव, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति एवं राजभाषा अधिकारी, उत्तर पश्चिम  रेलवे, बीकानेर ने कहा कि हिन्दी में काम करने को एक  दायित्व के रूप में लेते हुए हमें नई तकनीकी का लाभ लेना सीखना चाहिए,  तभी  हिन्दी का अधिकाधिक प्रचार- प्रसार हो सकेगा । श्री शर्मा ने कार्यशाला प्रतिभागियों को गूगल वॉईस टाईपिंग सुविधा का व्‍यावहारिक प्रशिक्षण दिया तथा बताया  कि अब हिन्दी में कम्प्यूटर पर टाईप करना समस्या नहीं है केवल आपके बोलने भर की देरी है। गूगल वॉईस टाईपिंग (गूगल वाणी लेखन) ने न केवल हिन्दी अपितु कई अन्य भाषाओं में टाईप करना अत्यंत आसान बनाया है । अतिथि वक्ता ने इस हेतु गूगल क्रोम, जी-मेल एकाउंट आदि जरूरी आवश्यकताओं को बताया ।


Description: DSC02144
कार्यशाला में व्‍याख्‍यान प्रस्‍तुत करते हुए श्री शर्मा

 

राजभाषा कार्यशाला के कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ.एन.वी.पाटिल ने प्रतियोगियों को नई तकनीकी का लाभ उठाने हेतु प्रोत्साहित करते हुए कहा कि गूगल वॉईस टाईपिंग भाषा विकास का साधन होने के साथ-साथ भाषा में सुधार का भी एक बहुत अच्छा जरिया बन सकता है। उन्होंने खासकर प्रशासनिक वर्ग को कहा कि वे इसके माध्यम से टिप्पणी एवं प्रारूप लेखन में सहयोग लें ।
राजभाषा कार्यशाला पश्‍चात प्रारम्‍भ हुए हिन्‍दी पखवाड़े के समापन कार्यक्रम में प्रभारी राजभाषा डॉ. सुमन्‍त व्‍यास ने केन्‍द्र में  दिनांक 01-15 सितम्बर के दौरान हिन्दी पखवाड़े की समस्‍त गतिविधियों का संक्षिप्‍त ब्‍यौरा प्रस्‍तुत किया ।
इस अवसर पर केन्‍द्र निदेशक डॉ.पाटिल ने हिन्दी पखवाड़े की गतिविधियों की सार्थकता एवं सभी प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी हेतु  उन्‍हें बधाई देते हुए कहा कि इन प्रतियोगिताओं के माध्‍यम से न केवल राजभाषा प्रयोग को बढ़ावा मिला है अपितु इनसे कार्मिकों की कार्यक्षमता में भी अभिवृद्धि हुई है । उन्‍होंने अन्य हिन्दी गतिविधियों में भी ऊँट से संबद्ध  विषयों पर पारस्परिक चर्चा हेतु शामिल किए जाने पर जोर दिया जिनसे केन्‍द्र को लाभ मिल सके । 
समापन कार्यक्रम के अंत में प्रभारी राजभाषा डॉ. सुमन्‍त व्‍यास ने केन्‍द्र में आयोजित हिन्‍दी पखवाड़े को सफल बनाने हेतु सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया । कार्यक्रम का संचालन श्री नेमीचंद ने किया ।                                          

 

Celebration of Swachchh Bharat Mission Fortnight by NRCC, Bikaner

           Under Swachchh Bharat Mission a fortnight full of activities is being organized by ICAR-NRC on Camel, Bikaner during 01-15 October 2016.  To create awareness, a composite programme of implementing cleanliness drive, an interactive scientists-farmers meet on clean milk production, lecture/poetry on importance on personal hygiene for healthy life and board drawing competition among students to understand importance of cleanliness of environment was organised on October 6,2016 involving nearly 700 number of farmers, animal owners, students and general public in ‘Mera Gaon Mera Gaurav’ adopted village Kalasar, Tehsil & District Bikaner.  While emphasising the importance of Swachchh Bharat Mission it was deliberated to inculcate habits to create clean and pollution free environment in and around the house, work/study premises so that the need of day to day cleaning should be minimal.  It was also emphasized through the poems on pollution and use of dustbins ,the need of protecting environment for ensuring quality life and need of greening the planet.  In the cleanliness drive the school premises was voluntarily cleaned by the staff of NRCC who were enthusiastically supported by the residents of Kalasar including staff and students of the school.  The Students pledged to maintain premises clean so that physically and mentally the school offers right atmosphere of learning.  In the interactive meet with dairy farmers it was stressed to improve the quality milk production so as to realize more remunerative prices from clean milk trading.  The management and health tips for clean milk production were offered and it was appealed to form self-help groups so that on a collective basis the clean milk production measures can be taken up and additionally the same group can be trained on value addition of the milk into the products of consumer liking and by suitable marketing more profits can be earned.  Similarly collective disposal of the waste from dairy industry can also help in proper utilisation of it to prepare value added manure from organic source.  In the thematic board drawing competition 3 best board drawings were awarded for passing creative message of cleanliness to people to improve the health of rural life.  For creating awareness about camel and its milk, the exhibition of technologies developed by NRCC was organized and all the participants were provided a glassful flavoured camel milk.  The farmers and students were addressed by Dr. N.V. Patil, Director, Dr. R. Singh, Principal Scientist and Mr. V.K. Pandey, Administrative Officer and poems were read by Dr. R.K. Sawal, Principal Scientist.  All the staff of NRCC along with residents of Kalasar and students & staff of the school, made the programme successful.

 

 

उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र द्वारा 24 सितम्बर से आईसीएआर खेलों का आगाज

 

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर द्वारा आयोज्य आईसीएआर जोनल (पश्चिमी क्षेत्र) खेलकूद प्रतियोगिता -2016 का दिनांक 24 सितम्बर, 2016 को डॉ.करणी सिंह स्टेडियम में शुभारम्भ होगा। प्रातः 9.00 बजे रखे गए शुभारम्भ समारोह के मुख्य अतिथि श्री वेद प्रकाश, जिलाधीश बीकानेर एवं अध्यक्षता केन्द्र निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल करेंगे। साथ ही बीकानेर नगर के कई संस्थानों के निदेशक, प्रभागाध्यक्ष, गणमान्य पदाधिकारी एवं जन प्रतिनिधि इस अवसर पर शिरकत करेंगे।

 

गौरतलब है कि केन्द्र द्वारा आयोजित यह टूर्नामेंट दिनांक 24 सितम्बर से 27 सितम्बर, 2016 तक चलेगा जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के अधीनस्थ राजस्थान सहित  महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, उत्तर प्रदेश व दिल्ली मुख्यालय के कुल 16 संस्थानों सहित 02 डीम्ड विश्‍वविद्यालय के लगभग 600 वैज्ञानिक, तकनीकी, प्रशा सनिक अधिकारी/कर्मचारी गण बतौर खिलाड़ी विभिन्न आउटडोर व इनडोर खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेंगे।

केन्द्र निदेशक डॉ.एन.वी. पाटिल के निर्देशन में केन्द्र द्वितीय बार इस आईसीएआर स्पोर्टस टूर्नामेन्ट-2016 के आयोजन को लेकर खासा उत्साहित है।  इसके लिए उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, खेल मैदान, खेल सुविधाओं, मैच रैफरियों व खिलाड़ियों के लिए उचित आवास व्यवस्था आदि तमाम सुविधाओं व व्यवस्थाओं की तैयारी में जुटा है। वहीं इस महत्वपूर्ण आयोजन को सफल बनाने हेतु जिला प्रशासन व जिला खेल अधिकारी, बीकानेर, राजुवास, कृषि विश्‍वविद्यालय सहित परिषद के बीकानेर स्थित सभी संस्थानों/केन्द्रों से पूर्ण सहयोग मांगा गया है।

 

इस टूर्नामेंट के आयोजन सचिव डॉ. राघवेन्द्र सिंह ने केन्द्र निदेशक डॉ. पाटिल एवं संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक कर विभिन्न मुद्दों पर चर्चा कर समितियों का गठन किया गया है ताकि इस बड़े आयोजन को सुगमता व सफलतापूर्वक आयोजित करवाया जा सके। साथ ही आईसीएआर अधीनस्थ संस्थानों के खिलाड़ी भी बीकानेर नगर की धरती पर खेलने को लेकर उत्सुक है।

 

 

Promoting startups in Camel Dairy
ICAR-NRCC, Bikaner organized a two day training programme during Aug, 11-12, 2016, for the people from Khedbrahma tehsil, Gujarat an area under Tribal Sub Plan. The trainees selected are actively already engaged in production of bovine milk, its collection and linking it with the supply to dairy milk cooperative from the village Laxmipura, tehsil Khedbrahma, Gujarat. Sh. Dineshbhai Patel, Chairman, Dairy Cooperative Society, Laxmipura was also part of the training programme, was enthusiastic to learn that Camel milk has so many human health advantages and can be traded at a higher cost. He assured that the camel milk producer’s society can be formed in the Khedbrahma tehsil by uniting Camel herders who keep female camels for milk production.
An entrepreneur from Ahemdabad interested to collect and process camel milk was also provided 5 days training during Aug 8-12, 2016at NRCC with a view to enrich him with knowledge base about camel milk properties, processing methods and present day situation of camel milk trade in India and abroad. It was evident that he is interested to take up startup activity for trading camel milk products by establishing linkages with camel milk producers from Gujarat and Rajasthan part of India.
Dr. N. V. Patil, Director briefed about the present scenario and future prospects of Camel dairy in India and abroad.
NRCC Scientists provided the training and exposure to all trainees in the field of camel dairy management, milk processing and related aspects of camel husbandry like feeding, breeding, health and reproduction management.
Dr. R. K. Sawal and Dr. Raghvendar Singh coordinated the training activities.              

उष्‍ट्र डेयरी में स्‍टार्टअप को बढ़ावा

भाकृअनुप-राउअनुके, बीकानेर द्वारा जन जातीय उप योजना के तहत खेड़ब्रह्मा, गुजरात के किसानों हेतु 11-12 अगस्‍त, 2016 को दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम अयोजित किया गया। चयनित प्रशिक्षु पहले से गोजातीय दूध के उत्‍पादन, इसके संग्रहण एवं लक्ष्‍मीपुरा, तहसील खेड़ब्रह्मा, गुजरात की सहकारी दुग्‍ध डेयरी को दुग्‍ध आपूर्ति कार्य में सक्रिय रूप से जुड़े थे। केन्‍द्र के इस प्रशिक्षण श्री दिनेशभाई, अध्‍यक्ष, डेयरी सहकारी दुग्‍ध सोसायटी, लक्ष्‍मीपुरा ने उत्‍साहपूर्वक भागी दारी निभाते हुए यह जाना कि ऊँटनी के दूध से मानव स्‍वास्‍थ्‍य हेतु बहुत सारे लाभकारी गुण है तथा इसका बड़े स्‍तर पर व्‍यवसाय किया जा सकता है। उन्‍होंने आश्‍वस्‍त किया कि दूध उत्‍पादन हेतु ऊँटनियां रखने वाले ऊँट पालकों की खेड़ब्रह्मा तहसील में उष्‍ट्र दुग्‍ध उत्‍पादक सोसायटी का गठन किया जाएगा।

        ऊँटनी के दूध संग्रहण एवं प्रसंस्‍करण में रूचि रखने वाले अहमदाबाद के एक युवा उद्यमी को ऊँटनी के दूध के गुणधर्मों, प्रसंस्‍करण विधियों एवं भारत एवं वैश्विक स्‍तर पर उष्‍ट्र दुग्‍ध व्‍यवसाय की वर्तमान स्थिति के परिप्रेक्ष्‍य में 8-12 अगस्त, 2016 के दौरान राउअनुके में प्रशिक्षण दिया गया। इसमें यह स्‍पष्‍ट हुआ कि वह (उद्यमी) भारत के गुजरात और राजस्थान के उष्‍ट्र दुग्‍ध उत्‍पादकों में पारस्‍परिक सम्‍पर्क स्थापित कर उष्‍ट्र दुग्‍ध उत्‍पादों के व्‍यवसाय हेतु स्टार्टअप गतिविधि प्रारम्‍भ करना चाहता है।

        डॉ.एन.वी.पाटिल, निदेशक द्वारा भारत एवं विश्‍व में उष्‍ट्र डेयरी की वर्तमान परिदृश्‍य में एवं इसकी भावी संभावनाओं के संबंध में जानकारी दी गयी।

        राउअनुके के वैज्ञानिकों द्वारा सभी प्रशिक्षणार्थियों को उष्‍ट्र डेयरी प्रबंधन, दुग्‍ध प्रसंस्‍करण एवं उष्‍ट्र पालन संबंधी पहलुओं यथा- आहार, प्रजनन, स्‍वास्‍थ्‍य  एवं जनन प्रबंधन संबंधी प्रशिक्षण दिया गया एवं संबद्ध गतिविधियों प्रदर्शित की गयी।  डॉ. आर.के.सावल एवं डॉ. राघवेन्‍द्र सिंह ने प्रशिक्षण गतिविधियों का संचालन किया।

 

 

 

केंद्र में स्वतन्त्रता दिवस मनाया गया

 

Notification about e-Procurement at NRCC

 

 

राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र ने राजस्‍थान पत्रिका के पौधरोपण कार्यक्रम में लिया भाग

सरेह नथानियान की गोचर भूमि में राजस्‍थान पत्रिका, बीकानेर के ‘हरयालो राजस्‍थान अभियान’  कार्यक्रम के तहत 11 हजार पौधे लगाने के लक्ष्‍य हेतु दिनांक 22.07.2016 शुक्रवार को तीन दिवसीय अभियान के पहले दिन डॉ. एन.वी. पाटिल के नेतृत्त्‍व में राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र के करीब 40 से अधिक वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने सरेह नथानियान, बीकानेर की गोचर भूमि में पौधरोपण किया तथा डॉ. पाटिल ने केन्‍द्र कर्मियों को सदैव ऐसे कार्यक्रमों से जुड़ने हेतु प्रोत्‍साहित किया।   डॉ. सुमन्‍त व्‍यास ने राजस्‍थान पत्रिका, बीकानेर के हरयालो राजस्‍थान अभियान कार्यक्रम में राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र की ओर से केन्द्र कर्मियों द्वारा प्रदत्त सक्रिय योगदान पर धन्यवाद दिया।
पौधरोपण की इस मुहिम में आमजन को पर्यावरण के प्रति प्रेरित एवं जागरूरक करने हेतु गोपालन राज्यमंत्री श्री ओटाराम जी देवासी, राज्यमंत्री श्री राजकुमार जी रिणवा, संसदीय सचिव  डॉ. विश्‍वनाथ, बीकानेर महापौर नारायण चौपड़ा सहित कई पूर्व मंत्री भी इस कार्यक्रम से जुड़े एवं आमजन को सामाजिक धरोहर के रूप में गोचर एवं ओरण भूमि के संरक्षण की आवश्‍यकता पर बल दिया।
पत्रिका के इस पौधरोपण अभियान  में राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र के अतिरिक्‍त परिषद के बीकानेर स्थित संस्‍थानों यथा- शुष्‍क उद्यानिकी संस्‍थान, राष्‍ट्रीय अश्‍व अनुसंधान केन्‍द्र, काजरी एवं स्‍वामी केशवानंद राजस्‍थान कृषि विश्वविद्यालय, राजुवास, महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय भी जुड़े। सरेह नथानियान में इन संगठनों एवं अन्‍य संस्‍थाओं से आए सैंकड़ों लोगों ने मिलकर गोचर की चार किलोमीटर परिधि में पहले दिन करीब 9 हजार से अधिक पौधे लगाए जिनमें नीम, खेजड़ी, रो‍हिड़ा, जाल आदि के पौधे उत्‍साहपूर्वक लगाते हुए पर्यावरण के प्रति अपनी चेतना प्रकट की।

 

 

आईसीएआर-एनआरसीसी बीकानेर ने मनाया 33 वां स्थापना दिवस

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर (एनआरसीसी) द्वारा 05 जुलाई, 2016 को अपने 33 वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य पर शेरेरां गांव (बीकानेर) में आयोजित कृषक वैज्ञानिक संगोष्ठी सह प्रसार शिक्षा एवं पशु स्वास्थ्य शिविर में करीब 300 से अधिक किसानों, पशु पालकों, स्कूली छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। शिविर में लाए गए लगभग 131 पशुओं की स्वास्थ्य सम्बंधी जांच व समस्याएं देखी गई जिन्हें उपचार एवं उचित चिकित्सकीय परामर्श एवं निःशुल्‍क दवाई व खनिज मिश्रण वितरित किए गए। ऊँटनी के दूध के प्रति जागरूकता बढ़ाने लाने हेतु ऊँटनी के दूध से विकसित सुगन्धित दूध का रसास्वादन करवाया गया एवं लगाई गई प्रौद्योगिकीय प्रदर्शनी में ग्रामीणों को रूझान देखा गया तथा स्कूली बच्चों हेतु आयोजित ललितकला एवं प्रश्‍नोत्तरी प्रतियोगिता में छात्रों-छात्राओं को पुरस्कृत किया गया।
कृषक वैज्ञानिक संगोष्ठी में विषय-विशेषज्ञ वैज्ञानिकों द्वारा ऊँटों एवं अन्य पशुओं की जनन संबंधी समस्याओं का पता लगाने,  ऊँटनियों का प्रजनन करवाने, पशुओं के विभिन्न रोगों में सावधानियां बरतने,  ऊँटनी के दूध का औषधीय महत्व समझने,  श्रेष्ठ उत्पादन हेतु पशुओं के आहार एवं खनिज लवण का विशेष ध्यान रखने संबंधी उपयोगी जानकारी दी गई वहीं परस्पर चर्चा में किसानों एवं पशु पालकों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का उचित निराकरण किया गया।
इस अवसर पर शेरेरां गांव के सरपंच प्रतिनिधि श्री कन्हैयालाल शर्मा ने एनआरसीसी द्वारा ग्रामीण अंचल में आयोजित इन कार्यक्रमों को सार्थक बताते हुए पशु पालकों से इन अवसरों का अधिकाधिक लाभ लेने हेतु प्रोत्साहित किया।
केन्द्र में आयोजित स्थापना दिवस समारोह में सभी कर्मचारियो ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया व डॉ. आर.के.सावल  ने केन्द्र की अनुसंधान गतिविधियों, महत्वपूर्ण उपलब्धियों, भावी अनुसंधान योजना, व्‍यावहारिक कार्यों एवं नए अधिदेशों की प्रभावकारिता आदि पर अपने विचार प्रकट किए।

 

ICAR-NRCC celebrates it 33rd foundation day

ICAR-NRCC, Bikaner celebrated its 33rd Foundation day on 5th of July, 2016 by organizing a programme at village Sherera, in District Bikaner. To create awareness regarding utilities of camel in the present day situation a drawing competition followed by the quiz competition was organized in which more than 200 students participated and the winners of these competitions were suitably awarded. The activities of the Centre and different technologies developed were also exhibited. In the Scientist Farmer interaction meet over 100 farmers participated in which issues related to animal husbandry in general were discussed. Extension cum animal health camp was also organized at the place where 131 animals were treated for different ailments like infertility, mastitis, pica, ecto and endo parasites etc.  Mineral mixture was provided to the participating farmers and they were apprised about mineral imbalance occurring in livestock of hot arid zones.
To promote camel milk in the rural areas folks, human health benefits of camel milk were explained and sweetened camel milk was provided to the participants. In the training held for participants, preparation of different milk products from Camel milk was explained. The farmers showed keen interest to initiate new venture and improve their economy by adoption of this technology of value addition to camel milk.
During this meeting, problems faced by the farmers were discussed specially in view of the declining trends in the Camel population, increased cases related to delayed puberty, longer post partum interval in cattle and buffaloes; ecto-parasites and mineral deficiency in animals. Preventive and curative measures were suggested by the Scientists to check decline in the productivity. They were also advised to follow a health calendar to decrease economic losses due to health disorders observed in the animals owned by them. Importance of community pasture and its role for livestock rearing was also explained. The farmers were advised to work for the betterment of the pasture so that it could sustain livestock of the village which would further help to improve the rural household income.
On this occasion, Sh. Kanhya Lal village head told the farmers to take advantage of the knowledge given by the scientific community of the Centre for improving productivity of livestock owned by them.
In the programme organized at the Centre the achievements/ technologies developed by the Centre since its inception were discussed and how to improve its functioning and to have better tourist inflow were also discussed. The staff of NRCC actively participated in the programmes organized at the Serera village and at the Centre. Dr. R. K. Sawal thanked the staff for actively participating in the activities organized.  

 

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र की राजस्थान एवं गुजरात के जन जातीय क्षत्रों में गतिविधियां
भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर द्वारा जन जातीय उप योजना के अंतर्गत सिरोही जिले के स्वरूप गंज, तहसील पिंडवाड़ा में दिनांक 27.06.2016  को ‘ऊँटों से दुग्ध उत्पादन व विपणन‘ पर कृषक-वैज्ञानिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। ऊँट पालन से जुड़े देवासी समाज की धर्मशाला में आयोजित इस संगोष्ठी में स्वरूप गंज व इसके आसपास के क्षेत्रों के 40 किसानों, ऊँट पालकों तथा राज्य पशु पालन विभाग के पदाधिकारियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस संगोष्ठी में ऊँटों के संरक्षण एवं संवर्धन, चरागाह संरक्षण व विकास, ऊँटों में पाई जाने वाली बीमारियों के बचाव, दूध व अन्य मूल्य संवर्धित उत्पादों के विपणन की व्यवस्था करना तथा स्वयं सहायता समूह के निर्माण तथा इसके उद्देश्य आदि पर चर्चा की गई। संगोष्ठी में इस बात पर जोर दिया गया कि ऊँट पालकों को ऊँटों के दुर्घटना आदि में असामयिक मौत पर उचित मुआवजा की व्यवस्था बीमे के रूप में कराई जानी चाहिए। इस दौरान  किसानों ने अपनी समस्याओं और उनके समाधन पर केन्द्र के वैज्ञानिकों से विचार-विमर्श किया। 
केन्द्र द्वारा अपने इसी दौरे के दौरान 27 जून को ही लक्ष्मीपुरा (खेड़ब्रह्मा) जिला साबरकांठा, गुजरात में भी कृषक-वैज्ञानिक संगोष्ठी -सह- प्रसार शिक्षा एवं पशु स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया जिसमें 72 ऊँट पालकों, पशु पालन विभाग के चिकित्सकों, केन्द्र के वैज्ञानिकों एवं लक्ष्मीपुरा में डेयरी कॉपरेटिव के पदाधिकारियों एवं भुज गुजरात की सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती कविता मेहता की सक्रिय भागीदारी रही। संगोष्ठी में मुख्य तौर पर स्वयं सहायता समूह का गठन, दूध उत्पादन, भंडारण एवं विपणन, ऊँटों में दूध उत्पादन क्षमता, ऊँटनी के दूध से मिलने वाले स्वास्थ्य लाभ, किसानों को ऊँटनी के दूध से उत्पाद बनाने आदि पर चर्चा की गई तथा ऊँट पालकों को व्यावहारिक प्रषिक्षण एवं सुगन्धित दूध का रसास्वादन करवाया गया। इस कार्यक्रम में केन्द्र निदेशक डॉ.एन.वी.पाटिल सहित डॉ.राजेश कुमार सावल, डॉ.राकेश रंजन, डॉ.देवेन्द्र कुमार एवं डॉ.काशीनाथ ने शिरकत की। डॉ.राजेश कुमार सावल ने ऊँट पालकों को ऊँटनी के दूध को बेचने के लिए एफ.एस.एस.ए.आई. द्वारा तय मापदंडों की जानकारी दी। केन्द्र के निदेशक डॉ.एन.वी.पाटिल ने कहा कि किसान सामूहिक रूप में आगे आएं, क्योंकि समूह द्वारा किए गए प्रयासों का परिणाम अधिक कारगर साबित होता है। उन्होंने ऊँट पालकों को वैज्ञानिक व तकनीकी जानकारी का लाभ लेने व समय-समय पर आधुनिक तकनीकों की जानकारी हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया। 

ICAR-NRCC activities in TSP areas of Rajasthan and Gujarat

A farmer-scientist interactive meet on “Camel milk production and marketing” was organized by ICAR-National Research Centre on Camel, Bikaner on 27 July, 2016 in village Swaroopgang (Pindwara) District Sirohi, Rajasthan. The meeting was held with Devasi community wherein 40 farmers cum camel rearers and state animal husbandry officials from nearby areas participated actively. The issue of conservation and development of camel and grazing areas for camel, preventive measures for various diseases of camel, developing infrastructure for production and sale of value added products from camel milk and starting self-help group with clear objectives were discussed in this meeting. During this meeting farmers discussed their problems and possible solutions were provided by scientists of the Centre.
Another farmer-scientist meet along with Animal Health cum Extension Education Camp was organized in village Laxmipura (Khedbrahma), District Sabarkantha, Gujarat in which 72 camel rearerss participated and Veterinarians from state animal husbandry department, Scientist of the Centre, Officials from dairy cooperative societies and a social worker Smt. Kavita Mehta from Bhuj Gujarat was invited to share experience of camel herders cooperative society. In this meeting the matters discussed were of constitution of self-help group, milk production, storage and distribution, milk production potential of camel, health benefits of camel milk and preparation of various products from camel milk by farmers. In addition, practical training and demonstration for production of flavoured milk was given to camel farmers and they relished the prepared flavoured camel milk. Director Dr. N V Patil, Dr. R. K. Sawal, Dr. Rakesh Ranjan, Dr. Devendra Kumar and Dr. Kashi Nath participated in this program. Dr. R. K. Sawal provided information to camel farmers on standards of camel milk for sale fixed by FSSSAI. The Director, Dr. N V Patil conveyed that farmers should come forward in the form of a self help group to make the efforts more useful and fruitful to initiate trade of camel milk. He also motivated camel farmers to gather information on modern techniques time to time and participate in training programs organized by the Centre.

भाकृअनुप-उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर ने मनाया अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसधान केन्द्र,  बीकानेर द्वारा 21.06.2016 को योग प्रशिक्षण एवं 22.06.2016 को योग पर व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन रखा गया।
कॉमन योग प्रोटोकॉल के अंतर्गत केन्‍द्र में दिनांक 21.06.2016 को प्रातः 7.00 से 8.00  बजे तक आयोजित योग प्रशिक्षण में केन्‍द्र एवं अश्‍व उत्‍पादन परिसर के 100 से अधिक वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने भाग लिया जिन्‍हें योग की विभिन्न क्रियाओं यथा- व्रजासन, भ्रामरी, ताड़ासन, शवासन कपालभाति, उष्ट्रासन, चक्रासन, मकरासन आदि का प्रदर्शन कर अभ्यास करवाया गया।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस कार्यक्रमों की कड़ी में दिनांक 22.06.2016 को सायं 4.00 बजे व्याख्यान कार्यक्रम में डॉ. देवाराम काकड़,  मुख्य प्रबन्धक,  देवेन्द्र योग संस्थान, भीनासर, बीकानेर ने मानव जीवन एवं योग विषयक व्याख्यान में कहा कि दैनिक दिनचर्या में योग को अपनाने पर हम स्वस्थ व दीर्घायु बने रहेंगे। योग साधना से व्यक्ति स्वयं पर नियन्त्रण एवं इलाज कर परिवार, समाज व राष्ट्र की सेवा भलीभांति कर सकता है। मुख्य अतिथि डॉ. बी.डी.शर्मा, निदेशक, केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर ने भारत की प्राचीन योग पद्धति को वैज्ञानिक व लाभदायक बताते हुए इस ओर पुनः लौटने की महत्ती आवश्‍यकता जताई। डॉ. एन.वी.पाटिल ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर 200 से अधिक देशों द्वारा योग को अपनाए जाने को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि योग के माध्यम से भारतीय जीवन पद्धति की महत्ता को सारा विश्‍व जान रहा है जिसमें संपूर्ण विश्‍व के लोगों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना निहित है।
केन्द्र के उपर्युक्त कार्यक्रमों के संयोजन में देवेन्द्र योग संस्थान, बीकानेर के योग शिक्षक श्री जितेन्द्र धुंधवाल, श्री रामेश्‍वर लाल एवं श्री कन्हैयालाल सेठिया ने सहयोग किया तथा इनमें भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र के बीकानेर स्थित संस्थानों/केन्‍द्रों के वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कार्मिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। दोनों कार्यक्रमों का संचालन श्री विजय कुमार पान्डे,  प्रशासनिक अधिकारी द्वारा किया गया।

ICAR-Camel Research Centre, Bikaner celebrated the International Yoga Day

On the occasion of Second International Yoga Day ICAR-National Camel Research Centre, Bikaner organized Yoga training programme on 21/06/2016  and a lecture on Yoga on 22/06/2016.
In this Training programme organized on 21/06/2016 from 7.00  AM to 8.00 AM different  yog asans  (Vajrasan, Bhramari, Taadasana, Shavasana Kpalbhati, Ustrasana, Chkarasan, Makrasan etc.) were performed by 100 above Scientists, Officers and Staff of NRC Camel and NRC Equines.
On 22/06/2016, Dr. Devaram Kakar, Chief Manager, Devendra Yoga Institute, Bikaner delivered a lecture on ‘Human life and yoga’, he emphasized that adoption of yoga in daily routine would help to keep healthy, increase longevity and help to have  better self-control of human body. Adoption of Yoga in day to day life can help to rejuvenate the society as healthy body serve the family,  society and nation in a better way. Chief guest of the function Dr. B.D. Sharma, Director, Central Institute of arid Horticulture, Bikaner said that Indian civilization contribution is adorable as the ancient yoga system given is scientific to keep the body and the mind healthy and we need to adopt in the interest of the nation and society .
DR. N.V.Patil, Director, NRC on Camel said that on the occasion of International Day of Yoga, adoption of this by over 200 countries is a significant achievement of its own kind, by this the whole world has come to know the importance of Indian life system with which the people can maintain good health and work for the betterment of the society as a single soul.
Yoga teachers Sh. Jitendra Dhundhwal, Sh. Rameshwar lal, and Sh. Kanhaya lal Sethiya, from Devendra Yoga Institute, Bikaner contributed in the conduct of the programme. Staff from different ICAR institutes as NRCE, CIAH and CSWRI also attended the Yoga day programmes organized by the Centre. The above programmes were coordinated by Sh.  Vijay Kumar Pandey, Administrative Officer of NRCC.

 

 

 

पर्यटन मंत्री दीपा ने भाकृअनुप-राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र का दौरा किया


माननीया पर्यटन मंत्री श्रीमती कृष्णेन्द्र कौर दीपा ने भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीसी) का दिनांक 24.05.2016 को दौरा किया। इस दौरान उन्हें केन्द्र के उष्ट्र संग्रहालय,  उष्ट्र डेयरी,  फीड पैलेट युनिट आदि का भ्रमण करवाया गया।
इस अवसर पर मंत्री महोदया के साथ केन्द्र निदेशक डॉ.पाटिल ने एनआरसीसी एवं उष्ट्र तथा पर्यटन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा के दौरान यह अपेक्षा जताई कि बीकानेर शहर से जोड़बीड़ (एनआरसीसी) क्षेत्र तक आने वाले मार्ग को साफ-सुथरा बनाने व पर्यटकों को आकर्षित करने हेतु सुंदर पोस्टरों, बैनरों आदि द्वारा इसे सुशोभित व आकर्षक बनाने पर पर्यटन व उष्ट्र प्रजाति के संरक्षण हेतु सहायक सिद्ध होगा। इस पर माननीया पर्यटन मंत्री श्रीमती कृष्णेन्द्र कौर दीपा ने अपनी सहमति व्यक्त की है। डॉ.पाटिल ने मंत्री महोदया से एनआरसीसी संस्थान के आस-पास के क्षेत्र में इस प्रजाति के लिए खतरा बनते जा रहे शहर भर के मरे जानवर डाले जाने तथा आवारा व जंगली कुत्तों की समस्‍या से निजात दिलवाने हेतु गुहार लगाई। इस पर पर्यटन मंत्री ने सम्बन्धित विभागों द्वारा इस समस्या का शीघ्र समाधान करवाने हेतु केन्‍द्र निदेशक को आश्वस्‍त किया। इस दौरान भावी समय में पर्यटकों को लुभाने हेतु कैमल सफारी,  कैमल रेसिंग आदि के आयोजन पर भी विचार-विमर्श किया गया। मंत्री महोदया ने एनआरसीसी के विकसित उष्ट्र दुग्ध उत्पाद ‘कुल्फी’ का रसास्वादन करते हुए इसे अत्यंत स्वादिष्ट बताया तथा विकसित दुग्‍ध उत्‍पादों (सुगन्धित दूध, कुल्फी, कॉफी, चाय, लस्‍सी आदि) का देशी व विदेशी पर्यटकों द्वारा अधिकाधिक लुत्फ लेने हेतु बीकानेर के जूनागढ़ परिसर में पर्यटन विभाग के माध्यम से इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करवाए जाने हेतु केन्‍द्र निदेशक को प्रोत्साहित किया।
केन्द्र निदेशक डॉ.एन.वी.पाटिल ने मंत्री महोदया को उष्ट्र संग्रहालय में भ्रमण के दौरान ऊँटों के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी महत्‍वपूर्ण जानकारी दी। इस दौरान पर्यटन मंत्री ने कहा कि केन्द्र द्वारा ऊँटों से जुड़ी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण जानकारी देशी व विदेशी पर्यटकों को उपलब्ध करवाया जाना एक प्रशंसनीय कार्य है।  इससे प्रदेश में उष्ट्र पालकों में पर्यटन व्यवसाय की ओर अग्रसर होने में रूझान बढ़ेगा।
तत्‍पश्‍चात उन्‍हें उष्ट्र गाड़े पर उष्ट्र डेयरी का भ्रमण करवाया गया तथा जहां कैमल मिल्किंग दिखाते हुए उन्‍हें यह जानकारी दी गई कि केन्‍द्र द्वारा बीकानेरी,  जैसलमेरी, कच्छी एवं मेवाड़ी नस्लों की मादा ऊँटनियों से अधिकाधिक दुग्ध उत्पादन प्राप्त करने हेतु इनका उचित प्रबंधन किया जाता है ताकि ऊँट पालक भाई इसे एक उदाहरण के रूप में लें तथा ऊँट से बोझा ढोने के काम के अलावा दूध की दृष्टि से उसका उपयोग लेना प्रारम्‍भ करें। केन्‍द्र की फीड पैलेट यूनिट में पशुओं हेतु तैयार आहार यथा- फीड पैलेट, फीड ब्‍लॉक के बारे में पर्यटन मंत्री महोदया को डॉ. पाटिल ने जानकारी दी कि इन्‍हें विभिन्‍न चारों और सांद्रण मिश्रण से एक‍ निर्धारित अनुपात में तैयार कर ऊँटों को खिलाया जाता है ताकि उन्‍हें संतुलित मात्रा में पौष्टिक आहार प्राप्‍त हो सके।

 

Interactive meet on “Camel and Human Medicine” organised at NRCC, Bikaner under the chairmanship of Dr. H. Rahman, Hon’ble Dy. Director General (Animal Science), ICAR, New Delhi on May 16, 2016

  In an interactive meeting held on May16, 2016 at ICAR-National Research Centre Camel (NRCC), Bikaner, on the theme of “Camel and Human Medicine”  with the collaborating Institute- Radiation Medicine Centre, Bhabha Atomic Research Centre (BARC), it was revealed that with sustained efforts of Scientists of ICAR-NRCC and RMC, BARC, for nearly 7 years, a Immuno-Radio-Metric- Assay (IRMA) kit for monitoring thyroid cancer patients, was developed indigenously. This (IRMA) kit, utilizes the special properties of Cameline antibodies produced at NRCC with high affinity and titre as a ‘capture antibody’. The Cameline antibody along with a monoclonal antibody (developed at RMC) and radiolabeled 125-I-Tg have been used to develop a very robust and sensitive IRMA kit to estimate serum thyroglobulin (Tg), a tumour marker for thyroid cancer, and is effective in diagnosing/monitoring patients with thyroid cancer metastasis and recurrence.

  Dr. H. Rehman, Deputy Director General (Animal Science), ICAR, New Delhi, while lauding the achievement of this collaborative project, expressed hope that such collaborations with other agencies/institutes are being favored by ICAR. He also expressed the hope that the kit which has been validated by Radio Medicine Centre, BARC, Mumbai on sufficient number of patients may be produced on a commercial scale. He also appreciated the other aspect of this programme of the R&D being carried out towards developing single domain antibodies from Cameline heavy chain antibodies for diagnostic/therapeutic application for Tuberculosis in human and animals.
During the presentation in the technical session for achievements of this project Dr.M.G.R. Rajan, Outstanding Scientist & Prof. HBNI & Head, Radiation Medicine Centre, BARC presented details of the use of the IRMA kit in about 1500 patients, and Dr. (Ms). S. Kulkarni, Senior Scientist, BARC, presented scientific details of the R&D being carried out to produce single domain antibodies prepared with active support from NRCC Scientists to raise the antibodies in camels after repeated booster of antigen and harvesting of PBMCs.

  While elaborating the details of collaborative projects NRCC have with other institutes of repute Dr.N.V.Patil, Director, NRCC informed about significant achievements of NRCC. In another project with S.P. Medical College, Bikaner the progress of development of anti-snake venom (ASV) for the poisonous snake Echis schoruki (commonly known as ‘Bandi’) found in Indian desert was presented by Dr. P.D. Tanwar and it was informed that the ASV thus prepared is now to be tested in near future in clinical trials involving snake bite cases in human.  While elaborating the significant functional food value properties of Camel milk being studied under collaborative study with National Dairy Research Institute, Karnal, Dr. Y.S. Rajput, Scientist Emiriatus and Ex-Head, Animal Biochemistry, narrated about the comparative advantage of Camel milk over milk from other species like Cow, Buffaloes and Goat in controlling cardinal parameters and management of diabetes type I. In one collaborative project of NRCC with an NGO, Baba Farid Centre for Mentally Challenged Children, Faridkot, Punjab, Dr. Pritpal Singh highlighted beneficial effects of Camel milk as an adjuvant therapy in children suffering from Autism and presented the data with internationally accepted Autism Treatment Evaluation Checklist (ATEC) score that the recovery in children provided with camel milk was significant and it can be basis for further study to know biochemical basis for improvement. The day long interactive meet involved presentations in two technical sessions followed by discussions involving all participants from collaborating institutes like BARC, Mumbai, S.P. Medical College, Bikaner, Baba Farid Centre ,Faridkot, Indian Institute of Science ,Bengaluru, Rajasthan University of Veterinary and Animal Sciences (RAJUVAS), Bikaner, NRC Camel and scientists from other ICAR institutes Central Sheep and Wool Research Institute, NRC Equine, Central Arid Zone Research Institute and Central Institute for Arid Horticulture. In the same meeting new collaboration proposal from Indian Institute of Science, Bengaluru was also discussed for signing MoU.  Prof. (Dr.) A.K. Gahlot, Vice Chancellor, RAJUVAS, Bikaner, Dr. B.N. Tripathi, Director, NRC equine and Dr. S.M.K. Naqvi, Director, CSWRI, Avikangar also participated in the meeting.  The convenor of meeting was Dr. S.K. Ghorui Principal Scientist and Dr. Raghvendar Singh, Principal Scientist co-convenor proposed vote of thanks.

 

 

भाकृअनुप-राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र ने किया जन जातीय क्षेत्रों का दौरा

भाकृअनुप-राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र, बीकानेर के वैज्ञानिकों एवं कार्मिकों के एक दल ने जन जातीय उपयोजना (टी.एस.पी.) के तहत गुजरात के ग्राम लक्ष्‍मीपुरा, तहसील खेडब्रह्मा में दिनांक 28 जनवरी, 2016  को ऊँट स्‍वास्‍थ्‍य शिविर एवं किसान गोष्‍ठी आयोजन किया। यहां आयोजित कार्यक्रम में 110 ऊँटों का स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण व उपचार किया गया। साथ ही जन जातीय पशु पालकों को प्रोत्‍साहित करने हेतु श्रेष्‍ठ नर व मादा ऊँट एवं दुग्‍ध उत्‍पादन प्रतियोगिताएं आयोजित की गई जिनमें पशुपालकों ने बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया। केन्‍द्र के निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल सहित अन्‍य वैज्ञानिकों ने पशुओं से जुड़ी विभिन्‍न स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं व सावधानियों के बारे में किसानों को जानकारी दीं और उनके पशुओं संबंधी समस्‍याओं के निराकरण के उपाय बताए। केन्‍द्र के इस दल ने उन्‍हें वैज्ञानिक प्रबंधन द्वारा अपने पशु से श्रेष्‍ठ उत्‍पादन प्राप्‍त करने संबंधी जानकारी दी जिससे वे पशुपालन के माध्‍यम से अधिकाधिक मुनाफा कमा सके । टी.एस.पी. के इस महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम के आयोजन में केन्‍द्र सहित कामधेनु विश्‍वविद्यालय, गुजरात के संयुक्‍त निदेशक (अनुसंधान) एवं गुजरात पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।जन जातीय उपयोजना के तहत ही एक अन्‍य कार्यक्रम का आयोजन ग्राम तेलपुर तहसील पिण्‍डवाड़ा जिला सिरोही (राजस्‍थान) में दिनांक 29 जनवरी, 2016 को किया गया। इसके तहत ऊँट स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण, किसान गोष्‍ठी एवं दुग्‍ध उत्‍पादन प्रतियोगिताएं आयोजित की गई जिनमें ग्राम तेलपुर एवं डींगरा के 23 ऊँट पालकों के करीब 320 ऊँट सहभागी रहे। एनआरसीसी वैज्ञानिकों ने इन ऊँटों की स्‍वास्‍थ्‍य जांच करने के उपरांत सर्रा एवं खुजली रोग के उपचार व बचाव के टीके लगाए। जन जातीय क्षेत्र के ऊँट पालकों को प्रोत्‍साहित करने हेतु श्रेष्‍ठ नर ऊँट व ऊँटनी  तथा ऊँटनी से दूध उत्‍पादन प्रतियोगिताएं आयोजित की गई जिनमें पशु पालकों की उत्‍साहपूर्वक भागीदारी देखी गई। ऊँट पालकों के साथ गोष्‍ठी के दरम्यिान ही ऊँट के दूध की गुणवत्‍ता के बारे में चर्चा व दुग्‍ध संग्रहण एवं विपणन पर मंथन किया गया। एनआरसीसी के वैज्ञानिकों ने यहां के पशु पालकों का ऊँटनी के दूध-विक्रय व्‍यवसाय से जुड़े होने पर प्रसन्‍नता व्यक्‍त करते हुए उन्‍हें ऊँटनी के दूध में पाए जाने वाले औषधीय गुणधर्मों के बारे में विस्‍तृत जानकारी दीं। वैज्ञानिकों ने बताया कि विदेशों में ऊँटनी का दूध काफी ऊंचे दामों पर बेचा जाता है अत:  इसका विपणन राष्‍ट्रीय एवं अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर होने से भविष्‍य में उन्‍हें अच्‍छा लाभ मिलेगा। साथ ही इस बात की जानकारी दी कि ऊँटनी के दूध की कीमत, उसमें पाई जाने वाली वसा के आधार पर तय नहीं की जाए क्‍योंकि इसमें कई स्‍वास्‍थ्‍य वर्धक गुण पाए जाते हैं, इसी कारण यह दूध अधिक महत्‍व का है। जन जातीय उप  योजना के तहत केन्‍द्र के इस कार्यक्रम को सफल बनाने में एनआरसीसी बीकानेर के निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल सहित डॉ. आर.के.सावल, डॉ. सुमन्‍त व्‍यास, डॉ. शिरीष नारनावरे, डॉ. राकेश रंजन, डॉ. मतीन अंसारी, डॉ. काशीनाथ, हरपाल सिंह, पशुपालन विभाग के संयुक्‍त निदेशक डॉ. तेजाराम, उप निदेशक डॉ. ए.ए.काजी, पशु चिकित्‍सक डॉ. सी.बड़गुजर, डॉ. तेम्‍बूरकर तथा गैर सरकारी संस्‍था पीपुल्‍स फॉर एनिमल (पी.एफ.ए.) के कार्यकर्ताओं सहित वहां के पशुपालन विभाग के कर्मचारियों का भी महत्‍वपूर्ण योगदान रहा।

ICAR-National Research Centre on Camel visited tribal sub plan areas

A team of scientists and technical staff of ICAR-National Research Centre on Camel, Bikaner organized Kissan Gosthi and Camel health camp in Laxmipura village, tehsil Khedbrahma, Gujarat on 28th January 2016 under Tribal Sub Plan (TSP). During this event 110 camels were examined and treated for different ailments.  To encourage tribal livestock farmers, best male camel and female camel and milking competitions were organized to judge superior germplasm available with camel herders which got overwhelming response from farmers. Director Dr. N. V. Patil and scientists of the centre discussed on various health problems of livestock and preventive and curative measures to prevent them. The team also provided information to farmers on to gain more profits from livestock farming. Joint Director (Research) Kamdhenu Vishwavidyalaya, Gujarat and Gujarat Animal Husbandry Department officials played an active role along with NRCC for organization of this event under Tribal Sub Plan. Another programme under Tribal Sub Plan was organized at village Telpur, tehsil Pindwara, district Sirohi (Rajasthan) on 29th January 2016. Under this programme, milk recording was done during milking at the ‘farmers door step’ for assessment of production and enthusiasm of the farmers engaged in the trade of milk. Judging of the lactating camel and also for breeding male and female camel was done. During the health camp 320 camels belonging to 23 camel herders from villages Telpur and Dingar participated. Scientists of NRCC examined and treated them for prevention of mange, trypanosomiasis and other ailments. During Kisan Gosthi, discussions were held on qualities of camel milk, its collection and marketing in the surrounding areas. NRCC scientists were pleased to see that camel farmers of this region are associated with trade of camel milk. The scientists also gave detailed information on medicinal properties of camel milk. It was also narrated that the milk of camel is sold at high prices in foreign countries therefore it is marketed in national and international market, it would fetch more prices. Farmers were also of the view that due to health benefits from camel milk its price should not be based upon fat content. Director Dr. N. V. Patil along with Dr. R.K. Sawal, Dr. Sumant Vyas, Dr. Shirish Narnware, Dr. Rakesh Ranjan, Dr. Matin Ansari, Dr. Kashi Nath, Harpal Singh, Dr. Tejaram Joint Director Animal Husbandry, Dr. A.A. Kazi Deputy Director, Veterinary Officers Dr. C. Badgujar & Dr. Tembhurkar and representatives from non-governmental organization-People For Animals (PFA) and staff of Animal Husbandry also contributed significantly for successful organization of this programme in the TSP area.  

 

उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र को मिला कृषि-सम्मान
जी न्यूज राजस्थान द्वारा दिया गया यह कृषि अवार्ड

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र को जी न्यूज राजस्थान की ओर से ‘कृषि सम्मान‘ अवार्ड-2015 से नवाजा गया। केन्द्र को यह सम्मान उनके द्वारा पशुपालन के क्षेत्र में विशेष योगदान देने पर प्रदान किया गया। जी न्यूज की ओर से केन्द्र को यह अवार्ड कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर में दिनांक 23.01.2016 को आयोजित एक समारोह में दिया गया। इस सम्मान-समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में श्री प्रभु लाल सैनी, कृषि मंत्री, राजस्थान सरकार तथा सम्माननीय अतिथि के रूप में श्री कुलदीप रांका, सचिव, कृषि, राजस्थान सरकार पधारे थे। जी राजस्थान की ओर से अपने इस समारोह का सीधा प्रसारण जी राजस्थान के साथ जी टेलिविजन तथा जी न्यूज चैनलों पर भी प्रसारित किया। जी न्यूज द्वारा केन्द्र को प्रदत्त इस कृषि सम्मान‘ अवार्ड -2015 अवार्ड को केन्द्र के डॉ.सुमन्त व्यास, प्रधान वैज्ञानिक ने इस समारोह में भाग लेते हुए प्राप्त किया।
जी न्यूज द्वारा कृषि सम्मान‘ अवार्ड -2015 प्राप्त होने पर एक अवसर के दौरान केन्द्र निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल ने प्रसन्नता जताते हुए सभी वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को बधाई संप्रेषित की तथा कहा कि समन्वित प्रयास से ही ऐसे महत्वपूर्ण सम्मान  प्राप्त किये जा सकते हैं जो न केवल आपको आगे बढ़ने में मददगार होते हैं अपितु इससे संस्थान का मान बढ़ता है तथा समाज में आपके कार्यक्षेत्र की व्याख्या की जाती है। डॉ. पाटिल ने उष्ट्र विकास व संरक्षण से अपनी बात को जोड़ते हुए केन्द्र-कार्मिकों को और अधिक प्रोत्साहित किया कि ऊँटों पर वैज्ञानिक अनुसंधान कर तथा उन्हें समाज में नए आयाम में स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध होकर कार्य करें जिससे उष्ट्र पालन व्यवसाय को पुनः चरम स्वरूप में लाने हेतु केन्द्र की ओर से महत्ती योगदान दिया जा सके तथा इस संस्थान की सार्थकता भी सिद्ध होती रहे। 

ICAR- National Research Centre on Camel received “ KRISHI- SAMMAN”

 ICAR- National Research Centre on Camel, Bikaner received “ KRISHI- SAMMAN” by Zee Rajasthan, a news channel of Zee group at state level function organized on dated 23.01.2016  at Agriculture Research Institute, Durgapura, Jaipur. The award was given for its special contribution in the field of animal husbandry. The Chief Guest of the award ceremony was Shri Prabhu Lal Saini, Agriculture Minister, Government of Rajasthan and Mr. Kuldeep Ranka, IAS and Agriculture secretary was the guest of honor. The event was broadcast live on Zee Rajasthan and other channels of Zee news group. Dr Sumant Vyas, Principal Scientist (Ani. Reproduction) received the award on behalf of the Centre.
Dr N.V. Patil, Director of ICAR-NRC on Camel, expressed pleasure on the award, conveyed greetings to all and said that this was result of coordinated efforts of all scientists, officer and employees. He further said that this award has given recognition to the work done by the Centre in the field of camel husbandry and shown importance of the Centre in the society. He said that such award infuse/give impetus to the workforce of the Centre to work towards the development and conservation of camel.

पशु पालकों ने एनआरसीसी वैज्ञानिकों से साझा किए अनुभव

बीकानेर 18 जनवरी, 2016 । भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकोनर में आत्मा परियोजना के तहत ‘ मरूक्षेत्र में ऊँट व अन्य पशु पालन संबंधी द्वितीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रारम्भ हुआ। आत्मा परियोजना के अन्तर्गत इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में गांव हिम्मतासर व गाढ़वाला के ऊँट पालक व किसान भाग ले रहे हैं जिसमें केन्द्र के वैज्ञानिकों विषय-विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षित किया जाएगा। इस अवसर पर डॉ. एन.वी.पाटिल ने कहा कि ऊँटों के घटते कुनबों पर विराम लगाने हेतु अब ऊँट को केवल बोझा ढोने जैसे कार्यों तक ही सीमित नहीं रखते हुए नए आयाम तलाशने होंगे। इस हेतु उष्ट्र दुग्ध उत्पादों को तैयार करना सीखें तथा इनका विपणन करें, वैज्ञानिक प्रबन्धन द्वारा एक ऊँटनी के जीवन काल में अधिकाधिक बच्चें प्राप्त करें। डॉ. पाटिल ने ऊँट पालकों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें तथा उनके पुरखों के पारम्परिक ज्ञान को भी केन्द्र से साझा करने की अपील की जिससे इस प्रजाति के नए पहलुओं पर भी कार्य किया जा सके। इस अवसर पर कार्यक्रम समन्वयक डॉ. एफ.सी.टुटेजा ने प्रशिक्षणार्थी पशुपालकों को यह जानकारी दी कि इस प्रशिक्षण के माध्यम से पशुपालक भाई, ऊँटों की प्रजनन पद्धतियों, जनन एवं जनन संबंधी विकार, उष्ट्र पोषण एवं चारा प्रबंधन, उष्ट्र परजीवी व संक्रामक रोगों के साथ उनके स्वास्थ्य की देखभाल तथा ऊँटनी के दूध से तैयार विभिन्न दुग्ध उत्पादों आदि के संबंध में उपयोगी जानकारी व प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे। पशुपालकों ने भी अपने इस अवसर पर अनुभव साझा करते हुए हिम्मतासर गांव में ही लगभग 20-25 लीटर तक ऊँटनी से दूध प्राप्त होने, बीकानेरी ऊँट नस्ल की सुंदरता का कारण व उसकी निर्बाध गति से गाड़ा सहित टिब्बे पर चढ़ने, लंबी दूरी तय करने संबंधी कई रौचक व महत्वपूर्ण जानकारियां  दीं। केन्द्र निदेशक व वैज्ञानिकों ने ऊँट पालकों के समक्ष अपनी मंशा जताई कि ऊँटनी से उनके ही गांव में इतने अधिक दूध उत्पादन करने वाली ऐसी नस्ल के वंश आदि का पता कर सूचित करें ताकि ऐसी नस्ल पर दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से अनुसंधान किया जा सके।  पशु पालकों को उष्ट्र डेयरी, उष्ट्र बाड़ों, उष्ट्र संग्रहालय का भ्रमण करवाया गया।

पशुपालकों ने ऊँटनी के दूध उत्पादों को बनाने की विधियों में दिखाई गहरी रूचि

एनआरसीसी में दो दिवसीय पशुपालन प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन

बीकानेर 16 जनवरी, 2016 । भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकोनर में आत्मा परियोजना के तहत दो दिवसीय (15-16 जनवरी) ‘मरू क्षेत्र में उष्ट्र पालन व्यवसाय प्रषिक्षण कार्यक्रम‘ का समापन हुआ। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में गांव लाखुसर व जालवाली के 34 ऊँट पालकों को केन्द्र के विषय-विषेषज्ञ वैज्ञानिकों द्वारा प्रशिक्षित किया गया। इस दो दिवसीय आत्मा प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह के मुख्य अतिथि डा.ए.के.पटेल, अध्यक्ष, केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, बीकानेर ने अपने उद्बोधन में कहा कि ऊँट की संख्या व उपयोगिता को बढ़ाने के लिए इस प्रकार के प्रशिक्षणों की महत्ती आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि उष्ट्र के विभिन्न उपोत्पाद जैसे- चमड़ी व हड्डियों से बने उत्पाद पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने का एक अच्छा स्रोत बन सकते हैं, इन्हें गांव के स्तर पर लघु उद्योग के रूप में विकसित किया जा सकता है। डा. पटेल ने पशुपालकों से अपेक्षा जताई कि पशु कल्याणार्थ, पशु पालकों को अपने पशुओं की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के उचित निवारण हेतु एनआरसीसी जैसे केन्द्रों के विषय-विशेषज्ञों से समय-समय पर प्रशिक्षण व जानकारी लेने हेतु तत्पर रहना चाहिए तथा इन केन्द्रों से सम्पर्क उनके पशु स्वास्थ्य व उत्पादन की दृष्टि से लाभप्रद होगा।

केन्द्र निदेशक व कार्यक्रम अध्यक्ष डा.एन.वी.पाटिल ने इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि केन्द्र द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी व व्यावहारिक प्रयासों जैसे- ऊँटनी की डेयरी, कैमल मिल्क पार्लर एवं उष्ट्र संग्रहालय आदि को एक व्यवसाय के रूप में विकसित कर पशुपालक आर्थिक उन्नयन तय कर सकते हैं। प्रबल संभावनायुक्त उष्ट्र डेयरी व्यवसाय को विकसित करने के लिए विषेषकर युवाओं को पहल करनी होगी तथा इसे सफल बनाने हेतु सामूहिक स्तर पर आगे आना होगा। डा.पाटिल ने पशुपालन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका का हवाला देते हुए कहा कि महिलाएं सीधे तौर पर पशुपालन से जुड़ी रहती हैं, अतः भविष्य में केन्द्र का प्रयास रहेगा कि ग्रामीण महिलाओं की भी ‘किसानों के द्वार‘ पर जाकर ऐसे प्रषिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अधिकाधिक भागीदारी सुनिष्चित की जा सके। डा.पाटिल ने उष्ट्र संरक्षण व विकास पर अपनी बात रखते हुए कहा कि यह केन्द्र उष्ट्र से संबद्ध पारंगत कुशल कारीगरों के मार्फत ऊँट पालकों व किसानों को रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण देने की भी मंशा  रखता है तथा भविष्य में इस दिशा में भी कार्य किया जाएगा।
कार्यक्रम समन्वयक डा.आर.के.सावल ने ऊँट पालकों व किसानों को दिए गए इस दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी दीं। उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षणार्थियों ने उष्ट्र प्रजनन, उष्ट्र पोषण, उष्ट्र के विभिन्न विकार एवं ऊँटनी के दुग्ध संबंधी उत्पादों के बारे में जानकारी दी। साथ ही ऊँट पालकों ने उष्ट्र डेयरी, उष्ट्र बाड़ों, उष्ट्र संग्रहालय व फार्म प्रक्षेत्र का भ्रमण किया। 
गांव लाखुसर के प्रगतिशील किसान श्री जेठाराम ने केन्द्र के इस दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि केन्द्र की उष्ट्र पालन संबंधी वैज्ञानिक उपलब्धियों व कार्य कलापों के बारे में जानने का पहला सुअवसर प्राप्त हुआ तथा प्रशिक्षण में केन्द्र द्वारा विकसित तकनीकी जैसे ऊँटनी के दूध से बनने वाले विभिन्न उत्पादों आदि की उपयोगी जानकारी से दल के सभी पशु पालक उत्साहित हैं। उन्होंने केन्द्र निदेशक से ऐसे महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रमों की अवधि बढ़ाए जाने की अपेक्षा जताई। इस अवसर पर प्रशिक्षणार्थियों को मुख्य अतिथि व कार्यक्रम अध्यक्ष द्वारा प्रमाण-पत्र वितरित किए गए।
समापन कार्यक्रम में धन्यवाद प्रस्ताव डा.एफ.सी.टुटेजा, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने दिया। विदित रहे कि आत्मा परियोजना के अन्तर्गत केन्द्र में आगामी दिवसों में अलग-2 प्रशिक्षण कार्यक्रमों का क्रम जारी रहेगा।

भाकृअनुप-राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र में राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की बैठक आयोजित

केन्‍द्र में राजभाषा नीति कार्यान्‍वयन के अन्‍तर्गत दिनांक 29.12.2015 को सायं 4.00 बजे समिति कक्ष में राजभाषा  कार्यान्‍वयन समिति की बैठक माह अक्‍टूबर-दिसम्‍बर, 2015 का आयोजन केन्‍द्र के निदेशक महोदय डॉ. एन.वी.पाटिल की अध्‍यक्षता में किया गया। इस बैठक में समिति गण के रूप में डॉ. अशोक नागपाल, प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी राजभाषा, डॉ.राकेश रंजन, वरिष्‍ठ वैज्ञानिक, श्री वी.के. पान्‍डे, प्रशासनिक अधिकारी, श्री भरत कुमार आचार्य, सहायक वित्‍त एवं लेखाधिकारी एवं श्री नेमीचंद, वरिष्‍ठ तकनीकी अधिकारी एवं सदस्‍य सचिव उपस्थित थे।

केन्‍द्र निदेशक डॉ. पाटिल की अध्‍यक्षता में आयोजित इस बैठक में भाकृअनु परिषद, नई दिल्‍ली, नराकास, बीकानेर से उक्‍त तिमाही के दौरान प्राप्‍त विभिन्‍न महत्‍वपूर्ण पत्रों तथा केन्‍द्र में राजभाषा के बेहतर कार्यान्‍वयन हेतु विभिन्‍न मुद्दों पर चर्चा कर निर्णय लिए गए।

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र में राजभाषा कार्यशाला का आयोजन

          भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र] बीकानेर में दिनांक 23 दिसम्बर 2015 को एक दिवसीय राजभाषा कार्यशाला का आयोजन रखा गया। इस कार्यशाला में अतिथि वक्ता के रूप में राजकीय (पी.बी.एम.) अस्पताल] बीकानेर में सह आचार्य एवं हृदय रोग विषेषज्ञ डा.संजय बेनीवाल ने ‘’पहला सुख निरोगी काया: हृदय (कार्डीओवेस्क्यूलर) संबंधी रोग एवं रोकथाम’  विषयक व्याख्यान प्रस्तुत किया तथा साथ ही हिन्दी भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषयों के प्रयोग पर भी प्रकाश डाला गया।
प्रभारी राजभाषा डा.अशोक नागपाल ने राजभाषा कार्यशाला के उद्देश्य व महत्व पर प्रकाश डालते हुए अवगत करवाया कि केन्द्र के निदेशक डा.एन.वी.पाटिल द्वारा इस आयोज्य राजभाषा कार्यशाला में ऐसे विषय का चयन करने हेतु प्रोत्साहित किया गया जो कि केन्द्र-कार्मिकों के सभी वर्गों से जुड़ा हो व महत्वपूर्ण भी हो। इस परिप्रेक्ष्य में आयोज्य कार्यशाला में ऐसे विषय को लिया गया है जो कि राजभाषा के प्रति परिष्‍कृत सोच व कर्त्‍तव्‍य को भी परिलक्षित करता है।

व्याख्यान सत्र में डा.संजय बेनीवाल ने अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि हिन्दी भाषा में व्याख्यान देना सुखद है क्योंकि यह हमारी राजभाषा ही नहीं अपितु मातृभाषा भी है जिसके कारण हम अपनी बात सहज रूप से समझ-समझा पाते हैं। डा.बेनीवाल ने प्रतिभागियों को आधुनिक जीवन शैली में स्वस्थ जीवन जीने हेतु महत्वपूर्ण जानकारी संप्रेषित की।

विचार-सत्र में सक्रिय प्रतिभागियों की स्वास्थ्य व उनसे संबंधित जिज्ञासाओं का डा.बेनीवाल ने उचित निराकरण प्रस्तुत करते हुए संतुष्ट किया। अध्यक्ष महोदय डा.आर.के.सावल]  प्रधान वैज्ञानिक ने केन्द्र निदेशक डा.पाटिल व राजभाषा इकाई की सराहना करते हुए कहा कि आयोज्य कार्यशाला में ज्वंलत मुद्दे को उठाया गया है जो कि निश्चित रूप से केन्द्र-कार्मिकों के लिए लाभदायक सिद्ध होगा।

भाकृअनुप-राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र ने मनाया हिन्‍दी पखवाड़ा
भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर में दिनांक 14-28 सितम्‍बर, 15 तक हिन्‍दी पखवाड़ा मनाया गया। केन्द निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल ने हिन्दी पखवाड़े के शुभारम्भ की विधिवत् घोषणा की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि हिन्दी दिवस एक चेतना का प्रतीक है जो हमें यह याद दिलाता है कि इस भाषा का देश को एकसूत्र में पिरोना में कितना महत्‍वपूर्ण योगदान है। डॉ. पाटिल ने कहा कि इस अवसर को एक परिपाटी के रूप में नहीं लेते हुए वास्तविक धरातल पर इसे पूरी इच्छाशक्ति से अपनाया जाना चाहिए तभी यह भाषा अपना प्रवाह निरंतर बनाए रख सकेगी और ऐसे आयोजनों की सार्थकता सिद्ध होंगी। उन्होंने विश्‍व हिन्दी सम्मेलनों का जिक्र करते हुए कहा कि हमें हिन्दी की महत्ता सिद्ध करने हेतु किसी अन्य देशों पर निर्भर नहीं रहना बल्कि मानसिकता में बदलाव लाकर इसे परिणित करना होगा। उन्होंने वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को हिन्दी दिवस की बधाई संप्रेषित करते हुए इसेगौरव के रूप में लेते हुए नूतन ऊँचाइयों पर ले जाने हेतु प्रोत्साहित किया। 
इस अवसर पर प्रभारी राजभाषा डॉ. अशोक कुमार नागपाल ने हिन्दी दिवस मनाए जाने की परंपरा के बारे में बताया तथा भाकृअनुप, नई दिल्ली के माननीय महानिदेशक डॉ.एस.अय्यप्पन द्वारा हिन्दी दिवस के अवसर पर जारी अपील को पढ़कर सुनाया। इस दौरान परिषद से श्रीमान राधा मोहन सिंह, माननीय कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्री, भारत सरकार द्वारा हिन्‍दी चेतना मास, 2015 पर प्राप्‍त संदेश को केन्‍द्र के सभी स्‍थनों पर चस्‍पां करवाया गया। डॉ. नागपाल ने पूरे पखवाड़े (14-28 सितम्बर,2015) की गतिविधियों के बारे में भी जानकारी दी तथा इनमें सभी की अधिकाधिक भागीदारिता हेतु अनुरोध किया गया। उद्घाटन सत्र के पश्चात् ही हिन्दी में शुद्ध लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें कुल 33 प्रतिभागियों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया। इस दौरान स्वच्छ भारत अभियान के तहत केन्द्र के डेयरी व औषधालय क्षेत्र के आस-पास के परिसर को स्वच्छ बनाया गया।
हिन्दी पखवाड़े के अन्तर्गत दिनांक 24.09.2015 को  दोपहर 2.00 बजे हिन्दी में तकनीकी/वैज्ञानिक पोस्टर प्रदर्शन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें वैज्ञानिकों ने आमजन में हिन्दी भाषा के माध्यम से जानकारी संप्रेषण हेतु पोस्टरों का प्रदर्शन किया। इसमें मूल्यांकन समिति के रूप में डॉ. बी.डी. शर्मा, डॉ. आर.ए. लेघा व श्री अनिल कुमार शर्मा ने प्रतिभागियों के पोस्टरों का मूल्यांकन किया। भाकृअनुप के बीकानेर स्थित संस्थानों ने भी इन सभी गतिविधियों में भागीदारी निभाई। इस कार्यक्रम के पश्चात् राजभाषा कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज, बीकानेर के डॉ. गौरव बिस्सा ने ‘व्यक्तित्व एवं नेतृत्व क्षमता का विकास‘ व्याख्यान में अलग-अलग व्यक्तित्व की परिभाषा दीं। उन्होंने कहा कि अपने कार्यक्षेत्र के काम को एक मिशन/अभियान की तरह देखें उसे क्रियान्वित करें। बिना क्रियान्विति के सारा ज्ञान व्यर्थ होता है। उन्होंने कहा कि हम अपनी समस्या का स्वयं समाधान ढूंढे न कि निर्भर रहें। सायं आयोजित हास्य कवि सम्मेलन में हास्य कवि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद‘ ने अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। उन्होंने ‘आरक्षण‘, कम्यूटर, भोजनपट्ट, टेस्ट टयुब बैबी, तोंद को नमस्कार आदि रचनाएं सुनाई। इसी अवसर पर अन्य हास्य कवि श्री विजय कुमार धमीजा ने ‘मेरे सरकार‘ ‘घर कभी भी आ सकते हों आदि रचनाएं सुनाते हुए श्रोताओं से तालियां बटोरी। इस अवसर पर केन्द्र निदेशक डॉ. एन.वी. पाटिल ने कहा कि यह संयोग ही है कि आज पोस्टर प्रदर्शन प्रतियोगिता के माध्यम से कुछ गहन, राजभाषा कार्यशाला के माध्यम से कुछ मौलिक तथा हास्य सम्मेलन में कुछ तनाव हल्का हुआ हैं। उन्होंने कहा कि प्रबन्धन का गुण आने पर व्यक्ति बुलंदियों को छू सकता है, रोजमर्रा की कार्यपद्धति में हमें भ्रष्‍टाचार, जीवन कैसे जिएं, पारस्परिक संबंध कैसे हों, देश के प्रति हमारा क्या दायित्व है, धर्म का सही रूप क्या होना चाहिए आदि तमाम प्रश्‍नों से रूबरू होना पड़ता है। ऐसे रचनात्मक मंच इनका निराकरण प्रस्तुत करने में सक्षम है। प्रभारी डॉ. अशोक नागपाल ने कार्यशाला के उद्देश्‍यों व हास्य कविता पाठ पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन श्री हरपाल सिंह कौण्डल ने किया।
दिनांक 28.09.2015 को आयोजित हिन्दी पखवाड़े के पुरस्कार वितरण व समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित डा.बी.एन.त्रिपाठी, निदेशक, केन्द्रीय अश्‍व अनुसंधान केन्द्र, हिसार ने अपने अभिभाषण में कहा कि मातृभाषा हिन्दी में मनोभाव सहज रूप प्रकट कर सकते हैं, यह स्थिति किसी अन्य भाषा के प्रयोग में उत्पन्न नहीं हो सकती। देश की एकसूत्रता में भाषा व संस्कृति का महत्ती योगदान है। डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि यद्यपि हिन्दी का उत्तरोत्तर विकास हो रहा है परंतु अभी भी इस ओर सुधार की आवश्‍यकता है, इसके लिए हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग होना चाहिए और ज्यों ज्यों इसका प्रयोग बढ़ेगा त्यों त्यों यह रूचिकर लगने लगेगी।
पुरस्कार वितरण व समापन समारोह के अध्यक्ष व केन्द्र निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल ने हिन्दी पखवाड़े के सफल आयोजन हेतु सभी कार्मिकों को बधाई देते हुए कहा कि अब वह समय आ गया है जब हमें हिन्दी दिवस को केवल परंपरा के रूप में न लेते हुए इसे सार्थक स्वरूप प्रदान करें, सुदृढ़ इच्छाशक्ति दिखाएं और इसका प्रयोग करने पर गौरवान्वित महसूस करें। डॉ. पाटिल ने कहा कि हम भारतीय हैं तो मातृभाषा में भी यह परिलक्षित होना चाहिए। उन्होंने कार्यालय स्तर पर भी हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करने पर जोर दिया ताकि जरूरतमंद ऊँट पालकों/किसानों को इसके माध्यम से लाभान्वित करवाया जा सके। डॉ. पाटिल ने हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग हेतु इसकी शैक्षणिक अनिवार्यता पर भी प्रकाश डाला।
इस अवसर पर प्रभारी राजभाषा डॉ. नागपाल ने केन्द्र में राजभाषा कार्यान्वयन स्थिति एवं हिन्दी पखवाड़े के अन्तर्गत आयोजित गतिविधियों के बारे में जानकारी दी। मुख्य अतिथि महोदय डॉ. त्रिपाठी व केन्द्र निदेशक डॉ. पाटिल के कर कमलों से पखवाड़े के दौरान आयोजित विभिन्‍न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। जिनमें हिन्दी में शुद्ध लेखन प्रतियोगिता में प्रथम श्री हरपाल सिंह कौंडल, द्वितीय डॉ. बलदेव दास किराडू तथा तृतीय डॉ. शिरीष नारनवरे रहे। हिन्दी में टंकण प्रतियोगिता में वैज्ञानिक वर्ग में प्रथम डॉ. शिरीष नारनवरे, द्वितीय डॉ. राकेश रंजन, तकनीकी वर्ग में प्रथम श्री दिनेश मुंजाल, द्वितीय डॉ. राकेश कुमार पूनियाँ तथा प्रशासनिक वर्ग में श्री विष्णु कुमार सोनी प्रथम व श्री हरपाल सिंह कौंडल द्वितीय स्‍थान पर रहे। हिन्दी में वैज्ञानिक/तकनीकी पोस्टर प्रदर्शन प्रतियोगिता में डॉ. फतेह चन्द टुटेजा, रा.उ.अनु.केन्द्र,बीकानेर ने प्रथम, डॉ. हरे कृष्ण, वरिष्ठ वैज्ञानिक, के.शु.बा.संस्थान,बीकानेर ने द्वितीय व डॉ. निर्मला सैनी, के.भे.ऊ.अनु.,बीकानेर ने तृतीय स्‍थान अर्जित किया। हिन्दी में निबन्ध लेखन प्रतियोगिता में श्री हरपाल सिंह कौंडल, श्री सुमेर सिंह तथा डॉ. काशीनाथ क्रमश: प्रथम,द्वितीय व तृतीय स्‍थान पर रहे। हिन्दी में श्लोगन/नारा/प्रचार वाक्य प्रतियोगिता में प्रथम श्री रामदयाल रैगर, द्वितीय डॉ. राकेश रंजन तथा तृतीय श्री जितेन्द्र कुमार  ने प्राप्‍त किया। पुरस्‍कार वितरण कार्यक्रम का संचालन श्री हरपाल सिंह कौण्डल ने किया।

 

 

Visit of Dushyant Chautala Member ICAR Governing Body to ICAR-NRC Camel
Sh Dushyant Chautala Honorable Member of Parliament and Member Governing body of ICAR paid visit to ICAR-NRC Camel on 4th October, 2015 to get first hand information about research activities National Research Centre on Camel for camels in the country. Director, Dr. N. V. Patil along with staff accorded warm welcome to Sh. Chautala and introduced him to various activities of the centre by conducting visit to various units. During the visit to Camel Museum, Dairy unit, Feed technology unit, Laboratory block and other important facilities he appreciated NRCC in promoting alternative utility role of camel as milch animal and promoting camel milk in the form of tea, coffee, lassi, flavored milk and kulfi and other milk products as the utility of camel for draft is reducing resulting in decline in population. While ongoing research activity using camel as biomedical research model for human use in developing products like vaccines, diagnostics and anti-snake venom was visited and was appreciative of consistent efforts of Scientists of the centre. He stressed to improve milk yield potential of camel through breeding involving state animal husbandry department. He was also appreciative of the efforts of NRCC in show causing of centre activities; and importance of camel in the Museum revealed at the centre; and asked to strengthen it to generate interest among the visiting people. He addressed the staff of NRCC, CSWRI and NRCE on this occasion; and assured that scientific, technical and supporting staff strength required would be filled at the earliest to meet the mandatory need of the centre which ultimately would benefit the camel herders by supporting their economy.

Initiation of ‘Mera Gaon, Mera Gaurav’ activity by NRCC, Bikaner

ICAR – National Research Centre on Camel, Bikaner launched the programme activities for MGMG in one of the 15 villages selected by the Centre, at village Kalasar, 60 km away from Bikaner city in tehsil Khajuwala.  In order to create awareness among the farmers who also practice various other allied agricultural activities like, animal husbandry, horticulture or value addition to agriculture produce, all 4 institutes located in Bikaner namely ICAR – NRC on Equine, ICAR -  CSWRI ARC, ICAR – CIAH and ICAR- CAZRI RS were also invited to explain various technologies developed by their respective institutes and interact with farmers.   More than 250 farmers from one village cluster – from Kalasar, Lakhusar, Tehar Jogana, Barju and Motigarh actively interacted with the experts and received technical know-how regarding technologies developed and displayed by all ICAR institutes. NRCC displayed various utility products out of camel leather, skin, bones and also demonstrated the technology of processing of camel milk for preparation of edible products like flavoured milk, kulfi and lassi.  The technologies like complete feed blocks and feed pallets were also displayed in the exhibition.  In order to create interest of farmers in camel production the competitions for best growing animal in male and female categories,  best male stud and best lactating she camel based on milk yield were organised.  The farmers having best animals in above categories were suitably awarded.  In an address to the farmers the chief guest Dr. Amar Singh Faroda, Ex-Chairman, ASRB, New Delhi and Ex-VC, MPUAT, Udaipur stressed about importance of such programmes for the benefit of the farmers in the region.  He while interacting asked the farmers to openly narrate the problems faced by them in crop production, horticulture, animal production, health or marketing of the produce etc. so that experts can help them to get rid of such difficulties and will ultimately help in increasing productivity and health.  He later stressed that the farmer now have to look towards agriculture as a business enterprise and learn important techniques and methods by which production for agricultural commodity would be increased.  Dr. P.P. Rohilla, Zonal Project Director, Zonal Project Directorate, Zone-VI, Jodhpur described the programme details of MGMG and lauded the efforts of NRCC in bringing together the experts of all discipline of agriculture to address the issues being faced by arid region farmers.  He also informed that regular visits of the scientists and technical personnel will help in the knowledge of real constraints faced by the farmers and which will help in application of practical solutions to the problems available on the ground.  NRCC in its health-cum-treatment camp organised for all livestock from the nearby villages around Kalasar, diagnosed and treated nearly 450 animals including 50 camels, 45 cattle and rest small ruminants for different ailments.  All the participating institutional experts narrated about different technologies developed by their institutes and also provided guidance on the relevant issued raised by the farmers during the interactive meet.   It was also informed that under the same programme other institutes have selected different village clusters wherein depending upon the farmers need all other institutes’ experts will provide their expertise so that agricultural activity in arid region will be profitable.  The village heads of Kalasar, Lakhusar and Jogana were appreciative of this initiative of ICAR and assured active cooperation of the villages in this endeavour.  

 

 

 

 

A seminar on overview of patenting system and biological diversity act in India was organized
Institute Technology Management Unit (ITMU) of ICAR-National Research Centre on Camel, Bikaner organized a seminar on 26.09.15 on “Overview of patenting system and biological diversity act in India”. Dr. Gargi Chakrabarti, Assistant Professor, National Law University, Jodhpur was the speaker on this occasion. In her very comprehensive and informative talk she explained about patenting system in India, to file a patent; criteria of patenting; who can apply for patent and the application procedure. The talk was followed by interactive discussion wherein scientists and technical officers from other ICAR institutes such as Central Institute of Arid  Horticulture and National Research Centre on Equines also participated.

पेटेंट प्रणाली और भारत में जैव विविधता अधिनियम की समीक्षा विषयक संगोष्‍ठी का आयोजन

भाकृअनुप-राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र, बीकानेर की संस्‍थान प्रौद्योगिकी प्रबंधन इकाई द्वारा दिनांक 26.09.2015 को ‘‘भारत में पेटेंट प्रणाली और जैव विवि‍धता अधिनियम की समीक्षा’’  विषयक संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्‍ठी में डॉ. गार्गी चक्रवर्ती, सहायक प्रोफेसर, राष्‍ट्रीय विधि विश्‍वविद्यालय, जोधपुर बतौर वक्‍ता थी। डॉ. गार्गी ने अपने सविस्‍तार व सूचनात्‍मक व्‍याख्‍यान में भारत में पेटेंट प्रणाली, पेटेंस हेतु आवेदन प्रक्रिया तथा इस हेतु कौन आवेदन कर सकता है, इसके मापदंड तथा आवेदन की क्‍या प्रक्रिया है, के बारे में जानकारी दीं। इस संवादात्‍मक  वार्ता में भाकृअनुप के बीकानेर स्थित अन्‍य संस्‍थानों केन्द्रीय शुष्क बागवानी  संस्थान एवं राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों और तकनीकी अधिकारियों ने भी भाग लिया।

 

 

 

भाकृअनुप - राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर ने रेगिस्तान के  गांव मनाया अपना स्थापना दिवस

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर ने 06 जुलाई, 2015 को अपना 32 वां स्थापना दिवस रेत के टीलों के बीच जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर स्थित एक छोटे से गांव लाखूसर में सार्थक स्वरूप में मनाया। इस विशेष दिवस पर पशु चिकित्सा शिविर के साथ-साथ कृषक-वैज्ञानिक संवाद बैठक में कृषि और पशुधन विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों से विषय विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान तथा  गांव के स्कूल में बच्चों के लिए विशेष आयोजन किए गए। चित्रकला प्रतियोगिता के दौरान बच्चों ने  ऊंट की घटती संख्या और आसपास के बदलते पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अपनी चिंता व्यक्त की। चित्रकला प्रतियोगिता में गांवों में ऊंट के विभिन्न उपयोग जैसे उष्ट्र गाड़े, खेत जुताई, उष्ट्र सवारी  और रेगिस्तान के मुख्य चारा वृक्ष ‘खेजड़ी’ चित्रों के मुख्य पात्र थे। इसी तरह छात्रों ने प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के दौरान अपने जवाब से पशुओं के कल्याण हेतु उत्साह व्यक्त किया। केन्द्र निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल ने कहा कि केन्द्र चाहता है कि ऊँटों से जुड़ी केन्द्र की उपलब्धियाँ,  वैज्ञानिक व तकनीकी ज्ञान से जरूरतमंदों तक पहुंचे, तभी सही मायने में उनकी सार्थकता सिद्ध हो सकेंगी। डॉ. पाटिल ने संस्थान द्वारा उष्ट्र नस्ल सुधार हेतु प्रदत्त सुविधाओं की ग्रामीणों को जानकारी दीं तथा ऊँट की घटती संख्या पर लगाम लगाने के लिए इसके दूध को व्यावसायिक स्वरूप में अपनाने हेतु संगठित स्वरूप में आगे आने का आवाहन किया। चूंकि गांवों में ऊंट का प्रयोग मुख्यतः भार वाहन के रूप में किया जाता है, गांव के छात्रों ने पहली बार केंद्र द्वारा तैयार किए गये ऊंट के दूध उत्पादों का स्वाद चखा और दुधारू पशु के रूप में ऊंट की क्षमता के बारे में उत्सुकतापूर्वक जाना।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के बीकानेर में स्थित विभिन्न संस्थानों द्वारा एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया जहां विस्तार साहित्य, तकनीकी  और विभिन्न उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। इस गोष्ठी और प्रदर्शनी में केन्द्रीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द, केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान तथा केन्द्रीय शुष्क   क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भी भाग लिया और अपने विचार रखे। पशु स्वास्थ्य शिविर में विषय विशेषज्ञों द्वारा लगभग 32 ऊँटों, 62 गांयों, 152 भेड़ एवं 100 बकरियों का इलाज, स्वास्थ्य जांच व उचित सलाह दी गई। पशुपालकों/किसानों को ‘करभ’ पशु आहार, लवण मिश्रण व खेजड़ी के पौधे वितरित किए गए। इस  गतिविधियो में करीब 150 किसान और 100 से अधिक विद्यार्थियों ने अपनी सक्रिय सहभागिता निभाई।
इस स्थापना दिवस में दोपहर बाद के सत्र में परिसर में  एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें गणमान्य अतिथि, पूर्व निदेशक, बीकानेर स्थित भाकृअनुप के संस्थानों के वैज्ञानिक और केन्द्र के तकनीकी, प्रशासनिक व अन्य सहायक कर्मचारियों ने भाग लिया। 
इस अवसर पर केन्द्र निदेशक और अन्य गणमान्य अतिथियों  ने बदलते परिवेश में ऊँट की उपयोगिताएं तलाशने और खासतौर पर ऊँटनी के दूध के उपयोग पर जोर दिया तथा  ऊँटनी के दूध को आने वाले समय में एक बेहतर विकल्प के रूप में बताते हुए कहा कि यदि संगठित स्वरूप में इसे किसान/ऊँट पालक अपनाएं तो यह दूध अपनी मानव रोगों आदि में फायदेमंद होने व विशिष्टता के कारण अधिक कीमत में भी बिकेगा जिससे इस प्रजाति का भविष्य उज्ज्वल होगा।  ऊंट मरु संस्कृति का आधार स्तंभ है यह दर्शाने हेतु ऊंट पर डिंगल भाषा में कविता पाठ भी प्रस्तुत हुआ।

ICAR-NRC on Camel celebrated Foundation day in a desert village

ICAR-National Research Centre on Camel, Bikaner celebrated its 32nd foundation day on July 6, 2015 in Lakhusar, a small village situated in midst of sand dunes about 40 km from district headquarter. Apart from animal treatment camp, scientist-villagers interface meeting, lectures by subject matter specialists from different fields of Agriculture and livestock science and special events were organised for children in the village school. During drawing competition, children expressed their concern for dwindling camel population and change in surrounding eco-system. The different uses of camel in the villages like carting, ploughing, riding and Khejri, the fodder tree of desert were main subjects of the drawings. Similarly the students also expresed their enthusiasm for the animal welfare during the Quiz competition. Director NRCC, Dr. N. V. Patil apprised farmers regarding research activities  and technologies developed at the centre since its inception and its utilities for the benfit of mankind and farming community. The commerial utility of Camel milk was also narrated and encouraged the camel farmers for formation of self help groups to utilize the camel milk for public in general. Since camel in the village is used for draft purpose, many of the participants and students tasted camel milk products for the first time developed by the Centre and became aware of potential of camel as a dairy animal.
An exhibition was also organised where extension literature, technolgies and products of different ICAR institutes situated in Bikaner were displayed. In addition to NRCC the experts from Central Institue on Arid Horticulture, Central Arid Zone Research Institute, Central Sheep and Wool Research Institute, National Research Centre on Equine also participated in the exhibition and Kissan gosthi. In animal health camp, 32 Camels, 62 Cows, 152 sheep and about 100 gaots were treated by the specialists.
Area specific mineral mixture, complete pelleted feed and Khejri plants were distributed to the farmers and they were also provided diagnosis and treatment care for various animal diseases. More than 150 farmers, 100 school students actively participated in these activities. 
In the afternoon session, a seminar was also organized in the premises of the Centre in which various dignitaries, former Director, Scientists from various ICAR Institutes, technical, administrative and supporting staff of NRCC participated. While raising concern over decreasing population of camel; various suggestions to check the decline were discussed in the light of technological and scientific advancements made to use camel as an animal of human benefit. The major emphasis laid was to popularize the Camel milk in the society and to promote the Camel farmers for marketing of Camel milk.

News report on TSP related activities at village Aadol, Jhadol, Udaipur
National Research Centre on Camel organized various programs related to animal husbandry in Jhadol Tehsil, Distt Udaipur on 22.-3.2-15 under Tribal Sub Plan scheme, that were attended by a team of scientists, technical officers and supporting staff including Director. Tribal people engaged in animal husbandry activities of rearing local, crossbred cows and buffaloes for milk; buffaloes, sheep and goat for meat, wool and milk and camel for draft and milk production purposes participated in these programs, which were focused to support their livelihood. Thirty two families of tribal community along with their livestock comprising 26 camels, 296 goats, 200 sheep and 47 cattle, progressive livestock farmers interested in modern animal husbandry practices like dairy processing and round the year fodder production, participated in these programs.  In the program organized on 23rd March, 2015; animals were examined for agalactia, slow body growth and different ailments.  In Kisan gosthi, information about importance of crossbreeding for improvement of local germ-plasm/ breed; nutritional supplementation for better care and improving productivity of grazing livestock, specially mineral supplementation during lean season to combat the nutritional deficiency were provided.
The health related problems for all categories of animals were also addressed by conduct of additional health camps, collection of various biological samples (blood, fecal and poll hairs) and treatment of sick animals. Competitions (total six) for best animal were also organized among the participating families to create awareness in animal husbandry activities and in total 6 competitions were organized.  The first three participants in each category were awarded prizes and others were given consolation prizes to encourage better livestock management practices. Views on various aspects of profitable dairy, goat husbandry and nutritional management were gathered from participants and solutions to their problems were suggested. The village Sarpanch emphasized the need of collecting information related to various programs for tribal people run by different development agencies like Panchyat Samiti, Gramin Bank and Animal Husbandry Department by villagers. Farmers were provided training for modern animal husbandry practices and production of value added products from camel milk.


राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र के वैज्ञानिकों, तकनीकी अधिकारियों एवं सहायक कार्मिकों के एक दल ने दिनांक 22.03.2015 को झाडोल तहसील, जिला उदयपुर में पशुपालन सम्बन्धी कार्यक्रमों का आयोजन किया। जन जातीय लोगों को आजीविका में सहायता प्रदान करने के उद्देश्‍य से आयोजित इन कार्यक्रमों में गांव आडोल के पशु पालन से जुड़े (यथा दूध हेतु स्‍थानीय एवं संकर नस्‍ल गाय, भैंसे, भेड़ एवं बकरी को मांस, ऊन तथा दूध तथा ऊँट को बोझा ढोने एवं ऊँटनी को दूध हेतु पालने वाले) लोगों ने भाग लिया। जन जातीय समुदाय के 32 परिवारों ने पशुधन यथा- 26 ऊँटों, 296 बकरियों, 200 भेड़ों एवं 47 गायों के साथ, आधुनिक पशु पालन पद्धतियों यथा डेयरी प्रसंस्‍करण एवं वर्षभर चारा उत्‍पादन में रूचि रखने वाले प्रबुद्ध लोगों, तथा गांव के सरपंच की इसमें सहभागिता रही। दिनांक 23 मार्च, 2015 को आयोजित कार्यक्रम में पशुओ में कम दूध उत्‍पादन व धीमी शारीरिक वृद्धि के करणों एवं उनमें विद्यमान बीमारियों की जाँच की गयी। बैठक में स्‍थानीय जर्मप्‍लाज्‍म/नस्‍ल संवर्धन हेतु संकर नस्‍ल की गायों की महत्‍ता, चरने वाले पशुओं की बेहतर देखभाल एवं उत्‍पादकता हेतु पोषकीय अनुपूरकता की आवश्‍यकता, विशेषकर सूखे मौसम के दौरान उनमें आई कमी में खनिज के अनुपूरण, की जानकारी उपलब्‍ध करवाई गई।

सभी प्रकार के पशुओं से जुड़ी स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं हेतु स्‍वास्‍थ्‍य शिविर भी लगाया गया जिसमें विभिन्‍न जैविकीय नमूनें (रक्‍त, मल, एवं सिर के बालों) लिए गए तथा रोगग्रस्‍त पशुओं का इलाज किया गया। सहभागी परिवारों में श्रेष्‍ठ जानवर प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया जिनमें कुल 6 प्रतियोगिताएं रखी गई। बेहतर पशुधन प्रबन्‍धन पद्धतियों को प्रोत्‍साहित करने हेतु प्रत्‍येक श्रेणी में प्रथम तीन प्रतिभागियों को पुरस्‍कार प्रदान किया गया तथा अन्‍य को सांत्‍वना पुरस्‍कार दिया गया। सभी प्रतिभागियों से लाभकारी डेयरी, बकरी पालन एवं पोषकीय प्रबन्‍धन के विविध पहलुओं पर राय मांगी गई एवं उनकी समस्‍याओं के समाधान सुझाए गए। गांव के सरपंच ने ग्रामीणों के विकास से जुडी संस्थाओ जैसे पंचायत समितियों, ग्रामीण बैंक एवं पशुपालन विभाग द्वारा जन जातीय लोगों हेतु उपलब्ध विविध योजनाओं संबंधी जानकारी प्राप्‍त करने पर जोर दिया। किसानों को आधुनिक पशुपालन पद्धतियों एवं ऊँटनी के दूध से निर्मित मूल्‍य संवर्धित उत्‍पादों के संबंध में प्रशिक्षण भी दिया गया।

News report of TSP related animal husbandry activities in Nubra valley, Ladakh

Team of scientists comprising Dr Sawal, Dr Ranjan and Dr. Shirish and Senior Technical Officer Dr Kashinath from National Research Centre on Camel, paid visit during 09-12 March, 2015 in Leh and Nubra valley (villages Hunder, Diskit, Sumoor and Tigger) of Ladakh, Jammu and Kashmir and organized health and extension camps and Kisan gosthi in order to know the population status of double humped (Bactrian) camels, problems related to health, nutrition and breeding and steps to motivate the villagers for camel husbandry. 
Health and extension camp was organized by team members at Camel Farm, Chuchut, Leh on 09 and 10th March 2015, wherein 18 camels were examined, blood and fecal samples were collected and sick animals were treated. Various problems related to camel husbandry were discussed in Kisan gosthi, and appropriate solutions were suggested. On 11 and 12th March 2015, a survey on status of double humped camel was conducted in villages Diskit, Hunder, Sumoor and Tigger of Nubra valley and problems related to camel health and camel husbandry were noticed and recorded. Health camps, two in village Hunder (a village located close to river Shiyog), one each in village Diskit and Sumoor, were organized wherein sick animals were treated and various aspects of healthcare and nutritional management were apprized. Samples of blood, faeces, fodder and concentrate feeds were collected for further laboratory analysis. Biometric measurements were recorded and their fodder and concentrate resources were assessed. Assisted mating in camels was and advice on selection of male and females for mating were given to avoid inbreeding. Four Kishan Gosthies (two in village Hunder and one each in Diskit and Sumoor) were organized in which local people participated and discussed various problems related to camel farming, utility of camel farming and income generation from camel farming. Data related to total number of camels, income from camel husbandry and draft and tourist activities related to camel were collected.  Mineral mixture, deworming drugs, skin-ointments, eye-medicines were distributed as per the subclinical and clinical cases presented by farmers. Information related to various activities of the centre and various facilities available at NRCC were disseminated. Farmers expressed their desire to collect more information/ undertake training and visit the centre at Bikner. In future, attempts will be made to encourage people of Leh and Ladakh for camel farming and provide training to them on various aspects of camel healthcare, nutritional management, methods of identification, selection of male and female for breeding and preparation of different value added products from camel milk.

 

दो कुबड़ीय ऊँटों की स्थिति के सर्वेक्षण, स्‍वास्‍थ्‍य, पोषण एवं प्रजनन संबंधी समस्‍याओं तथा ग्रामीणों को उष्‍ट्र पालन हेतु प्रोत्‍साहित करने के प्रयोजनार्थ लद्दाख के लेह एवं नुब्रा घाटी में दिनांक 9-12, मार्च, 2015 के दौरान केन्‍द्र के वैज्ञानिकों द्वारा स्‍वास्‍थ्‍य एवं प्रसार शिविरों तथा किसान गोष्‍ठीओ का आयोजन किया गया । इनमें संसथान के डॉ.आर.के.सावल, राकेश रंजन, शिरीष एवं काशीनाथ ने सक्रीय भागीदारिता निभाई।

उष्‍ट्र फार्म, छछूत, लेह में दिनांक 09 एवं 10 मार्च, 2015 को आयोजित स्‍वास्‍थ एवं प्रसार शिविर में टीम सदस्‍यों द्वारा 18 ऊँटों का परीक्षण किया गया, रक्‍त एवं मल के नमूनें लिए गए तथा  बीमार जानवरों का इलाज किया गया। उष्‍ट्र व्‍यवसाय से जुड़े विभिन्‍न समस्‍याओं पर चर्चा की गई एवं उपयुक्‍त समाधान सुझाया गया। दिनांक 11 एवं 12 मार्च 2015 को नुब्रा घाटी के डिसकिट, हुन्‍डर, सुमूर एवं तिगर गांवों में दो कूबड़ीय ऊँटों की स्थिति का सर्वेक्षण तथा उनके स्‍वास्‍थ्‍य स्‍तर एवं पालन संबंधी समस्‍याओं का अवलोकन किया गया। गांव हुन्‍डर (शियोग नदी के किनारे बसा गांव) में दो, डिसकिट व सुमूर में एक-एक, प्रसार एवं स्‍वास्‍थ्‍य शिविर आयोजित किए गए जिनमें बीमार पशुओं का इलाज किया गया तथा दो कूबड़ीय ऊँटों के स्वास्थ की देखभाल तथा पोषकीय प्रबन्‍धन के विभिन्‍न पहलुओं पर चर्चा की गई। प्रयोगशाला विश्‍लेषण हेतु रक्‍त, मल, चारा एवं दाना के नूमनें एकत्रित किए गए। जीवमिति विश्‍लेषण किया गया तथा उनके चारा एवं दाना के संसाधनों का मूल्‍यांकन किया गया। सहयोगी संसर्गता (असिस्टेड मेटिंग) का अवलोकन किया गया तथा संसर्ग हेतु नर एवं मादा के चयन सम्बंधित सलाह प्रदान की गई। चार किसान गोष्ठियॉं (हुन्‍डर गांव में दो, डिसकिट तथा सुमूर में एक-एक) आयोजित की गई जिनमें ऊँट पालकों से जुड़ी समस्‍याओं, उष्‍ट्र पालन की उपयोगिता एवं उससे आय सृजन संबंधी पहलुओं पर चर्चा के संबद्ध में स्‍थानीय लोग शामिल हुए। उष्‍ट्र की कुल संख्‍या, ऊँट पालन व्‍यवसाय से आमदनी एवं भार ढोने तथा पर्यटन गतिविधियों संबंधी आंकड़े संग्रहित किए गए। किसानों की जरूरतों के अनुसार खनिज लवण मिश्रण, कृमिनाशक दवाएं, त्‍वचा-मलहम, आंखों की दवा इत्‍यादि वितरित की गई। संस्‍थान की विविध गतिविधियां एवं उपलब्‍ध सुविधाओं से किसानो कों अवगत करवाया गया। किसानों ने संस्‍थान में आकर अधिक जानकारी/प्रशिक्षण लेने की इच्‍छा जाहिर की। भविष्‍य में लेह व लद्दाख के लोगों को उष्‍ट्र पालन की ओर प्रोत्‍साहित करने हेतु प्रयास किए जाएंगे एवं उन्‍हें उष्‍ट्र स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल तथा पोषकीय प्रबन्‍धन, पहचान चिन्‍ह की विधियां, प्रजनन हेतु नर एवं मादा का चयन, उष्‍ट्र दुग्‍ध से निर्मित मूल्‍य संवर्धित उत्‍पादों व अन्य विविध पहलुओं पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।

ऊँटनी के दूध की लोकप्रियता एवं समाज में स्वीकार्यता हेतु नवीन प्रयास

केन्द्र में आई.टी.एम.इकाई की ओर से दिनांक 25.03.2015 को ऊँटनी के दूध के प्रति जागरूकता लाने के प्रयोजनार्थ एक व्याख्यान कार्यक्रम के अवसर पर आमंत्रित अतिथि वक्ता डॉ.ए.के.पुरोहित ने ऊँटनी के दूध की लोकप्रियता एवं समाज में स्वीकार्यता हेतु नवीन प्रयास सुझाते हुए कहा कि संस्थान ने अपनी विस्तार गतिविधियों यथा-किसान मेलों, विचार गोष्ठियों, उष्ट्र स्वास्थ्य शिविरों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, रेडियो-टी.वी. एवं प्रसार साहित्य आदि के माध्यम से  ऊँट एवं इस प्रजाति से जुड़े समुदाय के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। अब केन्द्र ऊँट व ऊँट पालकों एवं आम जन के कल्याणार्थ ऊँटनी के दूध की समाज में स्वीकार्यता स्थापित करना चाहता है जो कि निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। परंतु ऊँट उद्यमिता को लाना, केन्द्र की इन विस्तार गतिविधियों से एक कदम आगे का प्रयास होगा, इसके लिए ऊँट पालकों, उष्ट्र हित-धारकों एवं व्यावसायिक प्रकृति के लोगों को एक मंच पर लाना होगा। उन्होंने उष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में ‘कॉर्पोरेट कल्चर‘ लाने हेतु सभी विषय-विशेषज्ञों की सेवाएं लेना उचित बताया।

व्याख्यान सत्र से पूर्व केन्द्र निदेशक डॉ. एन.वी.पाटिल ने केन्द्र की वर्षभर की प्रसार गतिविधियों को प्रस्तुत किया एवं ऊँटनी के दूध की लोकप्रियता एवं समाज में स्वीकार्यता हेतु सुझाए गए उपायों को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया और इस दिशा में और अधिक तीव्र प्रयास करने से उष्ट्र व्यवसाय को गति मिलेगी।

इस अवसर पर खुली चर्चा में केन्द्र के डॉ.सुमंत व्यास, डॉ.राघवेन्द्र सिंह, डॉ.सज्जन सिंह, डॉ.नरेन्द्र शर्मा एवं केन्द्र के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.यु.के.बिस्सा ने अपने विचार रखें। व्याख्यान कार्यक्रम का संचालन केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.आर.के.सावल ने किया।

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र में राजभाषा कार्यशाला का आयोजन

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर में दिनांक 20.03.2015 को एक दिवसीय राजभाषा कार्यशाला का आयोजन रखा गया। इस कार्यशाला में अतिथि वक्ता के रूप में राजकीय डूँगर महाविद्यालय, बीकानेर के डा.ब्रजरतन जोशी, व्याख्याता (हि.सा.) ने ‘साहित्य क्या और क्यों‘ तथा दूसरे अतिथि वक्ता श्री दिवाकर मणि, प्रबन्धक (राजभाषा), स्टैट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर, बीकानेर ने ‘कम्प्यूटर और युनिकोड‘ विषयक व्याख्यान प्रस्तुत किए। डा.जोशी ने साहित्य और भाषा की स्थिति पर अपना व्याख्यान केन्द्रित करते हुए कहा कि साहित्य केवल कथा, कहानी, नाटक तक ही सीमित नहीं है, शब्दों और अर्थों को ठीक-ठीक समझना भी साहित्य की श्रेणी में आता है। साहित्य के माध्यम से ही व्यक्ति अनुभूति को व्यक्त करता है। अन्त में उन्होंने कहा कि हम अपने समय की भाषा, साहित्य का संरक्षण कितनी सजीवता से करते हैं, यह महत्वपूर्ण है। श्री दिवाकर मणि, प्रबन्धक (राजभाषा), स्टैट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर, बीकानेर ने कम्प्यूटर पर हिन्दी का प्रयोग तथा युनिकोड संबंधी जानकारी देते हुए प्रशिक्षणार्थियों को कम्प्यूटर पर हिन्दी का सरल रूप में प्रयोग करना सिखाया। उन्होंने युनिकोड के अन्तर्गत युनिवर्सल कोडिंग, इसके लाभ आदि की विस्तार पूर्वक जानकारी दी। अन्त में उन्होंने कहा कि कम्प्यूटर पर हिन्दी में काम करने के अनेक विकल्प मौजूद है केवल इच्छाशक्ति जगाना जरूरी है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.आर.के.सावल ने राजभाषा हिन्दी का महत्व बताते हुए कहा कि राजभाषा कार्यशालाओं आदि के माध्यम से  धीरे-धीरे वातावरण ऐसा निर्मित हो रहा है जिससे राजभाषा में काम करना सहज व सरल है। यह जरूरी भी है ताकि किसानों को वैज्ञानिक जानकारी हिन्दी के माध्यम से देने में हम और अधिक कुशल बन सके। कार्यशाला के सत्र पश्चात विषय-विशेषज्ञों से रू-ब-रू होते हुए केन्द्र निदेशक डा.एन.वी.पाटिल ने राजभाषा कार्यशालाओं आदि के माध्यम से विद् जनों की सेवाएं मिलने को सुअवसर बताया। उन्होंने हिन्दी में रचनात्मक गतिविधियों के आयोजन की भी महत्ती आवश्‍यकता जताई। प्रभारी राजभाषा एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.फतेह चंद टुटेजा ने राजभाषा के उद्देश्‍य एवं महत्व पर प्रकाश डालते हुए केन्द्र में राजभाषा की प्रगति को सदन में रखते हुए इसके अधिकाधिक प्रयोग करने पर जोर दिया। धन्यवाद प्रस्ताव नेमीचंद, वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी द्वारा दिया गया।

Month long campaign of camel milk as health food and its marketing was successful

                NRCC initiated an activity with the support of local administration, Bikaner for the sale of camel milk in pasteurised 200 ml pouches as a part of camel milk popularisation campaign at Varishtha Nagrik Bhraman Path, Bikaner.  During the month long activity from 24th January to 24th February 2015 an average sale of about 100 milk pouches within one hour daily was achieved because of high demand and awareness about use of camel milk to get health benefits.  The main aim of this activity was to promote camel herders to initiate and engage themselves in the camel milk business whereby they can earn their livelihood by trading camel milk at reasonably better price.  To extend further the success of this activity the farmers of village falling in the districts of Jaisalmer and Jodhpur were apprised about the potential of selling camel milk at remunerative rates.  Accordingly nearly 200 farmers from the village of Dhulia, Barath Ki Dhani, Khetolai and Lawan of Jaisalmer and Jodhpur districts were motivated who agreed to form Self Help Groups and undertake training of pasteurisation and packaging of camel milk of their herd and market it in the places live Jaisalmer, Jodhpur, Pokhran etc.  NRCC will impart them training and will help them to register their SHGs for the purpose of collection, processing and marketing and in the near future will also hold a meeting involving farmer groups, scientists, bank officials and NGOs working in the area so that camel milk trade is established and the needy customers were convinced of the advantage of camel milk as functional food will be help to get regular wholesome camel milk supply at designated points.  In a similar effort NRCC is awaiting the response from farmers or farmer group to take up camel milk trade in the city of Bikaner and around.  In order to support the camel production system and also to make aware the success of this campaign the public representatives have been informed for possible policy initiate use require for conservation of camel production system in the area. 
प्रेस विज्ञप्ति
स्वास्थ्य खाद्य के रूप में ऊंट के दूध की उपयोगिता और इसके विपणन के लिये राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र का महीने भर का सफल अभियान

रा. उ. अनु. केन्द्र ने स्थानीय प्रशासन की मदद से वरिष्ट नागरिक भ्रमण पथ, बीकानेर में ऊंट के दूध को लोकप्रिय बनाने के अभियान के एक भाग के रूप में 200 मिली के पाउच में ऊंटनी के दूध की बिक्री की गतिविधि शुरू की। स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिए ऊंट के दूध के इस्तेमाल की उच्च मांग और लोगों में जागरूकता के कारण 24 जनवरी से 24 फ़रवरी, 2015 तक महीने भर के लंबे गतिविधि के दौरान एक घंटे के भीतर 100 दूध के पाउच की औसत दैनिक बिक्री हुई।   इस गतिविधि को आरंभ करने का  मुख्य उद्देश्य ऊंट पालक  को दूध के कारोबार में खुद को संलग्न करने हेतु  बढ़ावा देने के लिए किया गया जिससे वे बेहतर कीमत पर ऊंटनी के दूध के व्यापार से अपनी आजीविका चला सकें। इस गतिविधि की सफलता का आगे विस्तार करने के लिए जैसलमेर और जोधपुर जिलों में पड़ने वाले गांव के किसानों को लाभकारी दरों पर ऊंटनी के दूध की बिक्री से होने वाले लाभ के बारे में अवगत कराया गया। तदनुसार इस कम के  लिए जैसलमेर और जोधपुर जिलों के धुलिया, बाराथ की ढाणी, खेतोलोई और लावा̇ से लगभग 200 किसानों  को प्रेरित किया गया जो स्वयं सहायता समूह बनाने  और ऊंटनी के दूध के पस्तुरीकरण और पैकेजिंग का कार्य के प्रशिक्षण के लिए सहमत थे और जैसलमेर, जोधपुर, पोकरण आदि स्थानों में बिक्री करने को तैयार थे। रा. उ. अनु. केन्द्र इस कार्य हेतु उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करेगा जिससे उन्हें संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन और उनके स्वयं सहायता समूहों को पंजीकृत करने में मदद मिलेगी और केन्द्र निकट भविष्य में इस क्षेत्र काम कर रहे किसान समूहों, वैज्ञानिकों, बैंक अधिकारियों और गैर सरकारी संगठनों से जुड़े लोगों की एक बैठक का आयोजन करेगा जिससे कि ऊंटनी के दूध के व्यापार की स्थापना हो और जरूरतमंद ग्राहकों जो ऊंटनी के दूध का कार्यात्मक भोजन के रूप में लाभ के प्रति आश्वस्त हैं उनको चिन्हित ठिकानों पर नियमित रूप से ऊंटनी के दूध की आपूर्ति हो। इसी तरह केन्द्र बीकानेर में ऊंटनी के दूध के व्यापार शुरू करने के लिए किसानों या किसान समूह से प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा है। ऊंट उत्पादन प्रणाली को  समर्थन और इस अभियान को  सफल बनाने हेतु जनप्रतिनिधियों को संभव नीति की पहल के लिए सूचित किया गया है जिसकी क्षेत्र में ऊंट उत्पादन प्रणाली के संरक्षण के लिए आवश्यकता होगी।

भाकृअनुप-एनआरसीसी ने मनाया राष्‍ट्रीय विज्ञान दिवस

बीकानेर 28 फरवरी 2015 । भाकृअनुप-एनआरसीसी,बीकानेर में राष्‍ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर वैज्ञानिक विचार गोष्‍ठी आयोजित की गई। नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित महान वैज्ञानिक सी.वी.रमन की वैज्ञानिक खोज की घोषणा के उपलक्ष्‍य में आयोजित इस विज्ञान दिवस का प्रयोजन केन्‍द्र के एक वैज्ञानिक अनुसंधान संस्‍थान होने के नाते वैज्ञानिक उपलब्धियों से जन साधारण को अधिकाधिक लाभ पहुंचाना एवं उनमें चेतना लाना रहा।  

इस अवसर पर केन्‍द्रीय शुष्‍क अनुसंधान संस्‍थान (काजरी) का क्षेत्रीय केन्‍द्र, बीकानेर के प्रभागाध्‍यक्ष डॉ.एन.डी.यादव ने ज्ञान देश के किसान तक सुलभ स्‍वरूप में पहुंचाने एवं इसे क्रियान्वित कर लाभ दिलाए जाने हेतु वैज्ञानिक ज्ञान की सार्थकता पर जोर दिया। उन्‍होंने कहा कि इसके लिए अतिरिक्‍त प्रयास किए जाने होंगे।
इस अवसर पर केन्‍द्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं कार्यकारी निदेशक डॉ.आर.के.सावल ने कहा कि प्राप्‍त वैज्ञानिक उपलब्धियों को पशुपालकों-किसानों तक पहुंचाने हेतु वैज्ञानिक को एक कड़ी के रूप में सहयोग देना चाहिए। विज्ञान की लोकप्रियता बढ़ाने हेतु ऐसे दिवस महत्‍वपूर्ण है जिनमें विज्ञान से जुड़ी पुख्‍ता व संभाव्‍य बातें रखी जाती है जो कि अन्‍तत: ऊँट पालक-किसान के साथ साथ जन कल्‍याणार्थ स्‍वस्‍थ व सकारात्‍मक दृष्टिकोण का निर्माण करते हैं। 
केन्‍द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.राघवेन्‍द्र सिंह ने जहां केन्‍द्र तथा विश्‍व स्‍तर पर  ऊँटनी के दूध पर की गई शोध व इसके परिणामों की महत्‍ता पर बात कहीं वहीं डॉ.शरत चन्‍द्र मेहता ने ऊँटनी के दूध के संग्रहण, इसकी निरन्‍तर उपलब्‍धता आदि पर जोर दिया। गोष्‍ठी में उपस्थित सभी वैज्ञानिकों/अधिकारियों ने अपने विचार रखें। इस गोष्‍ठी का संचालन केन्‍द्र के वरिष्‍ठ वैज्ञानिक डॉ.राकेश रंजन ने किया।

ICAR-NRCC showcased Camel milk sale as an economic activity for the Camel herders
NRCC in its endeavor to popularize the Camel milk and promote it as business model to be adopted by the camel herders initiated an experimental sale in the urban area of Bikaner from last week of January 2015.The response from the Bikaner city people accepting camel milk as functional food entity is overwhelming and the sale of camel milk during first hour on everyday morning remains about20-30litres. The sale price of the said milk is also quite attractive to create interest and motivate the camel herders to accept the camel milk sale as a business. However due to lack of institutional support to form the self help groups or associations of these interested farmers, a campaign has been started by NRCC to educate  and motivate farmers to come forward as a group to take up this activity. Looking into the interest of group of farmers for trade of camel milk from Jodhpur and Jaisalmer districts, Kisan goshties and meets were organized at the villages of Lavaan and Sattasar of Jodhpur district on February 12 and in the villages of Dholia, Ganga Ram Ki Dhani and Khetolai of Jaisalmer district on February13, 2015.During the interactive meetings 81 farmers from these villages, scientists of NRCC and officials from state Animal Husbandry participated. The Camel herders shown keen interest to form SHG and Association of the farmers for the sale of Camel milk for which they desired technical knowhow as regards equipment’s required for pasteurization, chilling and also packaging of milk. The local veterinarian Dr. Umesh Kumar, VAS and the Joint Director(AH), Jaisalmer assured to get them in contact with district level dairy cooperatives and also some private dairies which can separately collect and process the camel milk. NRCC offered training to the camel herders for pasteurization and methods to improve shelf life of milk for which it was suggested to the group of farmers to attend a training at NRCC, Bikaner. In addition the training to process camel milk into various products of consumer interest was also suggested to the farmers and for its trade it was discussed that the places like Jaisalmer, Jodhpur, Pokhran could be initially selected. In order to register the SHGs/associations it was discussed that the processes of registration, mandate of the SHG and activities for the group will be decided as per the group members interested and NRCC will help to provide platform to bring together all the related agencies. During the said meeting nearly 2300 She Camels and about 1800 other animals like Camel studs, calves were collected for the health check up camps organized at 5 different places. The best milk animals were also exhibited by the farmers and average milk yield of the she camel was informed to be 5.5 liters/day. The Camel herders discussed about various problems faced in camel husbandry like lack of browsing/grazing resources, health insurance and lack of market for produce and animals beside restricted areas for the extensive rearing of these animals. However the Camel herders shown great interest in adoption of Camel milk as a business enterprise.
The group meetings were chaired by Dr. N. V. Patil Director, NRC Camel, Joint Director and Officials from Animal Husbandry, Jaisalmer; Scientists from NRC Camel, Dr. J. P. Singh, Head, CAZRI,  RRS, Jaisalmer and Dr A. K. Patel, Head, CSWRI ARC, Bikaner.

आईसीएआर-एनआरसीसी ने किया ऊँट पालकों हेतु आर्थिक गतिविधि के रूप में ऊँटनी के दूध का बिक्री प्रदर्शन एनआरसीसी द्वारा ऊँटनी के दूध को बढ़ावा दिए जाने के प्रयत्‍न स्‍वरूप जनवरी, 2015 के अंतिम सप्‍ताह में बीकानेर के शहरी क्षेत्र में इसकी प्रायोगिक बिक्री प्रारम्‍भ की गई ताकि इस पहल से प्रोत्‍साहित होकर ऊँट पालक इसे व्‍यवसाय के रूप में चुनें। बीकानेर के आमजन द्वारा ऊँटनी के दूध को कार्यात्‍मक खाद्य पदार्थ के रूप में जबर्दस्‍त स्‍वीकार्यता के फलस्‍वरूप रोज सुबह पहले घंटे के दौरान दूध की बिक्री लगभग 20-30 लीटर हो रही है। ऊँटनी के दूध की जबर्दस्‍त मांग, बिक्री व इसे प्राप्‍त उच्‍च मूल्‍य भाव को देखते हुए ऊँट पालक आकर्षित हो रहे हैं व इसे व्‍यवसाय के रूप में चुनने हेतु भी प्रोत्‍साहित हो रहे हैं। यद्यपि इच्‍छुक किसानों को संस्‍थागत सहायता मुहैया करवाने हेतु  एनआरसीसी द्वारा इन्‍हें स्‍व:सहायता समूहों या संगठित स्‍वरूप में आगे लाने हेतु एक अभियान चलाया गया है ताकि वे शिक्षित एवं प्रेरित होकर इसे व्‍यवसाय के रूप में अपनाएं। जोधपुर एवं जैसलमेर जिलों के ऊँट पालकों का ऊँटनी के दूध को व्‍यवसाय के रूप में चुनने  के रूझान को देखते हुए जोधपुर के लवॉं एवं सत्‍तासर के गांवों में 12 फरवरी 2015 एवं जैसलमेर के धोलिया, गंगा राम की ढाणी एवं खेतोलाई गांवों में 13 फरवरी, 2015 को किसान गोष्‍ठी एवं बैठकें आयोजित की गई। इन विचार-विमर्श संबंधी बैठकों में 81 किसानों, एनआरसीसी के वैज्ञानिकों एवं राज्‍य पशुपालन विभाग के अधिकारियों की सहभागिता रहीं। ऊँट पालकों ने ऊँटनी के दूध की बिक्री हेतु उष्‍ट्र हितधारक संग‍ठनों के निर्माण में गहन रूचि दिखाई तथा  इसके लिए उन्‍होंने दूध के पास्‍तुरीकरण हेतु जरूरी उपकरणों एवं, पैकेजिंग संबंधी तकनीकी जानकारी प्राप्‍त चाही। स्‍थानीय पशु चिकित्‍सक डॉ.उमेश कुमार, एवं पशु पालन विभाग, जैसलमेर के संयुक्‍त निदेशक, द्वारा उन्‍हें उन जिला स्‍तरी डेयरी सहकारी समितियों एवं अन्‍य कुछ नीजी डेयरियों के संपर्क में लाए जाने का आश्‍वासन दिया गया जो कि अपने स्‍तर पर दूध का संग्रहण एवं प्रसंस्‍करण करते हैं। केन्‍द्र द्वारा दूध को अधिक समय तक उपयोगी बनाए रखने के लिए पास्‍तुरीकरण एवं इसे रखने के तौर-तरीकों संबंधी प्रशिक्षण देने का प्रस्‍ताव ऊँट पालकों के समक्ष रखा गया जिसके अन्‍तर्गत ये किसान समूह रूप में एनआरसीसी,बीकानेर में प्रशिक्षण प्राप्‍त करें। इसके अलावा उपभोक्‍ता रूचि अनुसार ऊँटनी के दूध से विविध उत्‍पाद तैयार करने संबंधी प्रशिक्षण हेतु भी किसानों को प्रोत्‍साहित किया गया तथा सुझाव अनुसार इसके व्यवसाय हेतु प्रारम्भिक तौर पर जैसलमेर, जोधपुर, पोकरण जैसे क्षेत्र चुने जा सकते हैं। स्‍वयं सेवक संस्‍थाओं/संगठनों के पंजीकरण के क्रम में विचार कर निर्णय लिया गया कि एसएचजी के पंजीकरण, अधिदेश की प्रक्रिया एवं समूह की गतिविधियों का निश्चिय समूह सदस्‍यों की रूचि अनुसार किया जाएगा तथा एनआरसीसी इस हेतु सम्‍बन्धित एजेन्सियों को एक मंच पर लाने में सहायता प्रदान करेगा। इस बैठक के दौरान करीब 2300 ऊँटनियों तथा अन्‍य जानवरों में लगभग 1800 नर ऊँट एवं टोरडियों को उनकी स्‍वास्‍थ्‍य जांच हेतु 5 अलग-अलग स्‍थानों पर एकत्रित किया गया। ऊँट पालकों द्वारा दूधारू जानवरों का भी प्रदर्शन किया गया जिसके अन्‍तर्गत एक ऊँटनी का दैनिक औसत दुग्‍ध उत्‍पादन 5.5 लीटर होना सूचित किया गया। ऊँट पालकों द्वारा उष्‍ट्र पालन व्‍यवसाय में आ रही बाधाओं यथा- चरागाह संसाधनों में कमी, स्‍वास्‍थ्‍य बीमा एवं उत्‍पादन व पशुओं हेतु विपणन का अभाव तथा इन जानवरों के व्‍यापक स्‍वरूप में पालने हेतु सीमित क्षेत्रों, के बारे में बातचीत की गई। यद्यपि ऊँट पालकों का ऊँटनी के दूध को एक व्‍यावसायिक उद्यम के रूप में अपनाने हेतु गहन रूचि देखी गई। राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र के निदेशक डॉ.एन.वी.पाटिल की अध्‍यक्षता में आयोजित इस समूह बैठक में पशु पालन विभाग, जैसलमेर के संयुक्‍त निदेशक एवं अधिकारियों, उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र के वैज्ञानिकों, काजरी, आरआरएस, जैसलमेर के प्रधान डॉ.जे.पी.सिंह,एवं सीएसडब्‍ल्‍युआरआई,एआरसी,बीकानेर के डॉ.ए.के.पटेल ने शिरकत की।
                       

 

ICAR – NATIONAL RESEARCH CENTRE ON CAMEL, BIKANER launched campaign for popularisation camel milk as functional health food.

            ICAR – NRCC took initiative in reaching out to the general public to create awareness about functional health food benefits of camel milk by starting camel milk promotion point in the Bikaner city at ‘Senior Citizen Walkway’.  The need and urgency of the needy customers to get camel milk available at approachable points was noticed from the overwhelming response of the citizens who purchased 150 sachets of camel milk in the morning of 24.01.2015.  Various public representatives, Social leaders and dignitaries from various ICAR, SAUs and government institutions present during the maiden attempt of NRCC appreciated the efforts of the Centre to establish a fruitful connect between producers and consumers.   Under the said activity the Centre would make camel milk available for the residents of Bikaner for one month from 7 to 8 AM daily and while doing so the efforts will be made to provide scientific basis and information to the general public about functional food value and benefits of camel milk for the management of modern day human health problems like Diabetes Type I, Autism, Hyper Tension, Milk allergy to children, Non-alcoholic liver disorders, T.B., Asthma etc.  Another important purpose of this initiative is to project camel milk sale as an economic activity for the camel herders who are presently not using this commodity to gain commercial benefits.  The response and need generated by this activity is expected to promote the camel herders to unite and form self-help groups who can decide taking up camel dairy as a vocation.  The Centre is also planning to bring the needy customers and camel milk producers on negotiating table to establish regular demand-supply chain.  NRCC will help the camel milk producers to understand the concept of clean milk production and will provide training and pasteurisation and storage to ensure availability of clean camel milk to the customers.  The month long activities planned during this period will include identification of interested farmers, visit and training of camel farmers to the Centre, training for the activities like processing and packaging so that the farmers as a group are ready for marketing of camel milk. 
भाकृअप-राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र,बीकानेर द्वारा ऊँटनी के दूध को कार्यात्‍मक स्‍वास्‍थ्‍यकारी खाद्य पदार्थ के रूप में अपनाने की मुहिम तेज
भाकृअप-राउअनुके द्वारा अपनी नूतन पहल में मानव स्वास्थ्य हेतु लाभदायक ऊँटनी के दूध का बीकानेर के वरिष्ठ नागरिक भ्रमण पथ पर आमजन को उपलब्ध करवाया गया। आमजन में उष्‍ट्र दुग्‍ध की मांग एवं आवश्‍यकता को देखते हुए बीकानेर शहर में सुलभ स्‍थान को चुना गया तथा दिनांक 24.01.2015 प्रात:काल इसके शुभारम्भ पर 150 से अधिक लोगों ने ऊँटनी के पास्तुरीकृत दूध का सेवन किया। इस अवसर पर विभिन्‍न जन प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्त्‍ताओं, गणमान्य जनों एवं विभिन्‍न भाकृअनुप, कृषि विश्‍वविद्यालयों एवं सरकारी संस्‍थाओं के अधिकारियों ने शिरकत कीं तथा उन्‍होंने उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र की उत्‍पादक एवं उपभोक्‍ता के मध्‍य एक हितकारी-समन्‍वय स्‍थापित करने की पहल को सराहा।
इस गतिविधि के अन्‍तर्गत केन्‍द्र द्वारा ऊँटनी का दूध बीकानेर वासियों के लिये एक माह तक (प्रातः 7.00 बजे से 8.00 बजे रोजाना) तक उपलब्‍ध करवाया जाएगा तथा इस दौरान आमजन को ऊँटनी के दूध का कार्यात्‍मक खाद्य पदार्थ के रूप में महत्‍व एवं विभिन्न मानव रोगों यथा- मधुमेह टाइप-1, ऑटिज्‍म, उच्‍च रक्‍तदाब, बच्चों में दूध की एलर्जी, गैर मादक यकृत विकारों, टी.बी., अस्‍थमा आदि में वैज्ञानिक प्रबन्‍धन संबंधी जानकारी दी जाएगी।  केन्‍द्र द्वारा इस पहल के पीछे एक और मंशा यह भी है कि अधिकाधिक ऊँट पालक जो कि अभी भी ऊँटों को दुग्‍ध व्‍यवसाय की दृष्टि से उपयोग नहीं कर रहे हैं, इस गतिविधि से प्रेरित होकर दूध को अपनी आजीविका के रूप में अपनाएं। इस महत्‍वपूर्ण पहल के सकारात्‍मक परिणाम इस बात की मांग करते हैं कि ऊँट पालक अब संगठित एवं स्‍व:सहायता समूहों के रूप में आगे आएं ताकि वे उष्‍ट्र दुग्‍ध को स्वाथ्यवर्धक पेय के रूप में डेयरी व्यवसाय के लिए चुनें। केन्‍द्र का यह भी प्रयास रहेगा कि जरूरतमंद लोगों एवं उष्‍ट्र दुग्‍ध उत्‍पादकों के मध्‍य एक श्रृंखला विकसित हो ताकि ऊँटनी के दूध की आपूर्ति नियमित हो सके। राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र द्वारा अपनी अवधारणा स्‍पष्‍ट कर उष्‍ट्र दुग्‍ध उत्‍पादकों को स्‍वच्‍छ दुग्‍ध उत्‍पादन हेतु प्रोत्‍साहित किया जाएगा जिससे उपभोक्ताओं को पास्तुरीकृत उष्ट्र दुग्ध मिल सके। इस दौरान एक माह की समयावधि योजना क्रियान्वित की जाएगी जिसमें इच्‍छुक ऊँट पालकों की पहचान कर केन्‍द्र में उन्हें दुग्‍ध प्रसंस्‍करण एवं पैकिंग संबधी प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा ताकि वे ऊँटनी के दूध के विपणन हेतु एक समूह के रूप में उभर सके।

अब शहर में बिकेगा ऊँटनी का दूध

वरिष्ठ नागरिक भ्रमण पथ पर उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र द्वारा ऊँटनी के दूध बिक्री की पहल

बीकानेर 19 जनवरी 2015 । ऊँटनी के दूध की गुणवत्ता, औषधीय महत्व तथा आमजन की मांग को देखते हुए राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर, वरिष्ठ नागरिक भ्रमण पथ (मेजर पूर्णसिंह सर्किल के पास स्थित) पर ऊँटनी के दूध की बिक्री का शुभारम्भ दिनांक 24.01.2015 से प्रातः8.00 बजे से होगा। अन्य दिवसों में इस दूध की बिक्री प्रातः 7.00 बजे से 8.00 बजे तक की जाएगी। केन्द्र में ऊँटनी के दूध में विद्यमान विभिन्न पोषकीय गुण धर्मों को ध्यान में रखते हुए परीक्षण एवं शोध के अनुसार यह विभिन्न मानव रोगों यथा- मधुमेह,टी.बी., दमा, ऑटिज्म, बच्चों में दूध की एलर्जी आदि में फायदेमंद पाया गया है। ऊँटनी के दूध की मानव स्वास्थ्य में इन्हीं लाभकारी गुणों को देखते हुए ही केन्द्र दूध के प्रति जागरूकता व जन सहभागिता चाहता है ताकि यह दूध न केवल मानव रोगों में स्वास्थ्यवर्धक खाद्य (फंक्शनल फूड) पदार्थ बनकर उभरे अपितु इससे उष्ट्र प्रजाति का विकास व संरक्षण भी  प्राप्त हो। इस मूल प्रयोजन से केन्द्र बीकानेर नगर वासियों के लिए इस दूध की बिक्री शुरू करने की पहल कर रहा है। वर्तमान में दिनांक 24 से प्रारम्भ होने वाली यह पहल एक माह तक चलेंगी तथा लोगों के रूझान व आवश्‍यकता को देखते हुए इस संबंध में आगे की रूपरेखा तय की जाएगी।
बतौर केन्द्र निदेशक डा.एन.वी.पाटिल- दिनांक 24 से प्रारम्भ होने वाले इस जन सहभागिता कार्यक्रम में राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र के विषय-विशेषज्ञ वैज्ञानिकों द्वारा ऊँटनी के दूध का बेहतर उपयोग करना बताया जाएगा तथा सम्बन्धित सामग्री भी वितरित की जाएगी। इससे पूर्व ऊँटनी के दूध के फायदे वैज्ञानिक आधार पर समझाने व आमजन में जागरूकता लाने के प्रयोजन से राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर द्वारा अपने समिति कक्ष में दिनांक 22.01.2015 को दोपहर 2.00 बजे से एक प्रेस कान्फ्रेंस का आयोजन किया जा रहा है जिसमें आप सभी मीडिया बन्धुओं की उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है।
ह0-
(राघवेन्‍द्र सिंह)
प्रधान वैज्ञानिक

 

Krishak Diwas organized


Krishak Diwas was organized by NRCC on 27th August, 2014 wherein various issues regarding to crop husbandry, horticulture and animal husbandry were discussed and in turn solutions were offered. On this occasion, animal health camp was also organized which attracted good response as about 50 animals consisting of Camel, Buffalo, Cow, Sheep and Goat were examined and treated for different ailments. The villagers who were facing problem of attack of white grub in groundnut crop for which different solutions were suggested through soil and seed treatment, to prevent loss of crop and queries on the animal husbandry were addressed by the Scientists of NRC Camel and CSWRI-ARC Bikaner. Khejri plantation done by a progressive farmer was visited; suggestions for plantation of different grasses to establish as silvi-horti pasture were suggested. Village Seminar by NAARM trainees was also organized on this occasion. In the meeting Dr. N. V. Patil, Director NRC Camel; Dr. A. K. Patel, Head CSWRI-ARC Bikaner; addressed the farmers and Mr Prem Saharan, Sarpanch Gadwala village, appreciated the efforts of NRCC to have interaction meetings with farmers since last two months to address issues of crop and animal husbandry. The programme was coordinated by Dr. R. K. Sawal.

 

Hon’ble Governor,Rajasthan visits  National Research Centre on Camel, Bikaner

            The Hon’ble Governor of Rajasthan Dr. Margaret Alwa visited the National Research Centre on Camel, Bikaner on November 07, 2012 and was appreciative of the achievements of the Centre as “Yeoman Service done by the Centre towards protection of the camel species in India”.  While the concern was mentioned towards declining camel population in India she endorsed the need of having defined breeding policy by State Animal Husbandry Departments of Rajasthan and Gujarat where the camel breeds exist.  She appreciated efforts of Centre towards promoting camel as “Milch Animal” as the traditional role of camel for draught and agriculture is reducing.  Dr. N.V. Patil, Director of Centre took her around the various activities of the Centre viz. Camel Museum, Milk Parlour, Camel Dairy, Complete Feed Plant and explained beneficial effects of Camel Milk towards human health and efforts of the Centre towards developing of the camel milk products like Ice cream, Flavoured milk, Lassi and various indigenous products which can serve as functional foods.  It was also appraised about Centre’s research efforts in exploiting camel immunology for human medicine purpose by developing diagnostics, treatment and preventive measures using Camel antibodies.  During the visit she enjoyed the traditional camel ride to see various facilities of the Centre and was excited to observe the white camel born last year at the Centre.

 

Hon’ble Governor was very much delighted and expressed her happiness over the all-round developmental activities that are being done to uplift the economic status of the camel farmers. She also assured to address the issues like approval of MMPO status to camel milk and milk products and also concern of centre towards menace of stray animals because of disposal of dead animals near the institute campus and that of other sanitary requirements  to save this important animal-- camels and development around the campus of this world class premier research Centre on camel through state and local administration.

 

A WHITE COLOURED MEWARI CALF BORN AT NRCC

A typical white coloured camel calf has born at National Research Centre Camel, Bikaner on December 14, 2010. This white coloured Mewari breed camel calf is a female and it has a birth weight of 33 kg. The Mewari breed of camel has a potential to produce about 10 to 12 litres of milk per day and due to its’ milk production potential it about eight thousand camels of the breed are sustaining in the tract. The lactation length in the dromedary is also very high; it is 16 months as compared to 9-10 months in most milch species of livestock. The scientists of the Centre are committed to establish herd of the best camels of true to the breed type by scientifically breeding them at the Centre. The Centre is aiming to produce best studs of the breed by selective breeding for enhancing the milk production in the field so that the nutritional and financial status of the camel farmers can be uplifted and the species survives.

Our country has four main breeds of camel. They are Bikaneri, Jaisalmeri, Kachchhi and Mewari. The Bikaneri breed is known for baggage and load carrying capacity. The Jaisalmeri camels are known for long distance travel and race potential. The Kachchhi breed inhabits the ran of Kachchh and are good in milk production potential while the Mewari breed is adapted to the hilly terrains and is serving due to its’ milk production potential. The Mewari camels are stouter and little shorter in height. They have strong hindquarters, heavy legs, hard and thick foot pads and long hairs. The milk vein and udder is well developed. The breed is sustaining in the tract due to its milk production potential. Hence, apart from maintaining true to the breed animals of the breed, this Centre took the initiative and has started a project to enhance the milk production of the breed in particular and species as a whole.

Phenotypes of the dromedary breeds are not as distinct as we see in other species e.g. cow, buffalo, sheep or goat mainly because of the lack of color variation among the dromedary breeds and inter breeding by the farmers. This centre has taken this initiative to develop elite herds of each breed and paid enough emphasis on concentrating the breed characteristics. With continuous selection and time to time introduction of true to the breed studs of the breed from the breeding tract, the Centre has achieved success in concentrating the breed characteristics in most animals maintained at the Centre, for example the black or dark brown coat colour and jeepra characteristics have been concentrated in the Bikaneri camels, the light brown coat color and compact body have been concentrated in the Jaisalmeri camels, the brown coat color and droopy lower lip have been focused in Kachchhi and light creamy to white coat colour and udder development was focused in the Mewari. As a result this white coloured camel calf was born here.

हिन्दी सप्ताह, २०११ का कार्यवृत्त

हिन्दी दिवस, २०११ के शुभ उपलक्ष्य पर राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर में हिन्दी सप्ताह उत्साही व मनोरम वातावरण में मनाया गया।

उद्‌घाटन समारोह

केन्द्र में हिन्दी सप्ताह का शुभारम्भ, केन्द्र निदेशक डॉ.नितीन वसन्तराव पाटिल द्वारा दिनांक १३-१९ सितम्बर तक हिन्दी सप्ताह मनाए जाने की विधिवत्‌ घोषणा की गई।
इस अवसर पर राजभाषा इकाई प्रभारी डॉ.बिहारी लाल चिरानियाँ द्वारा हिन्दी दिवस मनाए जाने की परंपरा के सन्दर्भ में सभी वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अवगत करवाते हुए केन्द्र को राजभाषा कार्यान्वयन के अन्तर्गत प्राप्त उपलब्धियों एवं गतिविधियों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया साथ ही हिन्दी सप्ताह के दौरान आयोज्य गतिविधियों की जानदारी दी गई।
हिन्दी दिवस की पूर्व संध्‍या पर आयोजित इस कार्यक्रम में केन्द्र निदेशक डॉ. नितीन वसन्तराव पाटिल ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि हिन्दी दिवस पर रखे जाने वाले सभी कार्यक्रम हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किये जाते हैं। इनसे हमें हिन्दी में अधिकाधिक कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। डॉ. पाटिल ने कहा कि हिन्दी प्रयोग में सुधार लाने के लिए आवश्‍यकता इस बात की है कि हिन्दी में काम करना शुरू कर दिया जाए। हमें अन्तरमन से इस पर मनन करना चाहिए। उन्होंने सभी को अपने-अपने कार्यक्षेत्र में स्वाभाविक रूप से शत प्रतिशत राजभाषा का प्रयोग करने तथा हिन्दी सप्ताह के दौरान आयोज्य सभी कार्यक्रमों/गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लेने हेतु प्रोत्साहित किया।

(१) हिन्दी में आशुभाषण प्रतियोगिता-प्रथम चरण

केन्द्र के कार्मिकों में अभिव्यक्ति कौशल एवं उपयुक्त वातावरण के सृजन के प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए दिनांक १४ सितम्बर, २०११ को हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आशुभाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। केन्द्र में आयोजित यह प्रतियोगिता हिन्दी सप्ताह के अन्तर्गत आयोजित की गई। प्रथम चरण में आयोजित इस प्रतियोगिता में केन्द्र के वैज्ञानिक एवं तकनीकी अधिकारियों, अनुसंधान सहयोगियों एवं अनुसंधान अध्येताओं ने भाग लिया।
इस अवसर पर सर्वप्रथम माननीय महानिदेशक डॉ.एस.अय्‌यप्पन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली की ओर हिन्दी दिवस, २०११ के अवसर पर जारी अपील को पढ़कर सुनाया गया। इस प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में डॉ. शिवराज छंगाणी, साहित्यकार, बीकानेर एवं डॉ.मधु अग्रवाल, विभागाध्यक्ष, महारानी सुदर्शन कन्या महाविद्यालय, बीकानेर को आमंत्रित किया गया। डॉ. शिवराज छंगाणी ने सभी प्रतिभागियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि आज का दिन गौरव का दिन है, इसे हम हिन्दी दिवस के रूप में मना रहे हैं, हिन्दी भारत के विकास एवं प्रगति के लिए एकता के सूत्र के रूप में जानी जाती है। इसका प्रयोग करते समय देश के प्रति स्वाभिमान का बोध होता है। हिन्दी भाषा भारत की राजभाषा है।
प्रतियोगिता में अन्य निर्णायक के रूप में पधारी डॉ. मधु अग्रवाल ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि केन्द्र द्वारा राजभाषा के विकास में आयोजित यह कार्यक्रम निश्चित रूप से एक सार्थक प्रयास है क्योंकि इसमें भाग लेने वाले न केवल हिन्दी भाषी अपितु हिन्दीत्तर वक्ताओं ने भी अपनी बहुत अच्छी अभिव्यक्ति दीं। इस प्रकार के प्रयास देश स्तर पर किए जाने की आज महती आवश्‍यकता है ताकि सभी के बीच एक बेहतर संवाद स्थापित हो सकेगा।
केन्द्र निदेशक एवं कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ.नितीन वसन्तराव पाटिल ने सभी प्रतिभागियों को बधाई दी और कहा कि उन्होंने इस औचक भाषण प्रतियोगिता में विषय को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर अपनी मूल अभिव्यक्ति दी है। इस प्रकार के प्रयास केन्द्र में निरन्तर किए जाने अपेक्षित हैं जिससे हमारी राजभाषा उत्तरोत्तर विकास की ओर अग्रसर होती रहे। राजभाषा कार्यान्वयन हेतु यह आवश्‍यक भी है कि हम इस प्रकार की गतिविधियों को सार्थक रूप दें जिससे सभी लाभान्वित हों। केन्द्र निदेशक डॉ.पाटिल ने आशा व्यक्त की कि हिन्दी के माध्यम से केन्द्र और प्रतियोगियों के व्यक्तित्व में निश्चित रूप से बदलाव आएगा।
श्रीमान शरद पवार, माननीय कृषि उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री, भारत सरकार द्वारा हिन्दी दिवस, २०११ संबंधी प्राप्त प्रेरणाप्रद ''संदेश'' को केन्द्र के मुख्‍य भवनों पर लगाया गया।

विजेता प्रतिभागी (वैज्ञानिक एवं तकनीकी वर्ग)

प्रथम              डॉ.राघवेन्द्र सिंह
द्वितीय             डॉ.चंपक भकत
तृतीय             (१) डॉ.शरत चन्द्र मेहता  (२) डॉ.निर्मला सैनी
प्रोत्साहन         (१) श्री दिनेश मुंजाल
(२) हिन्दी में आशुभाषण प्रतियोगिता-द्वितीय चरण

केन्द्र में हिन्दी सप्ताह, २०११ के अन्तर्गत दिनांक १५.०९.२०११ को हिन्दी में आशुभाषण प्रतियोगिता के द्वितीय चरण का आयोजन किया गया। इसमें प्रशासनिक एवं शेष तकनीकी वर्ग ने भाग लिया।
इस अवसर पर निर्णायक मंडल के रूप में भारतीय जीवन बीमा निगम, बीकानेर की पूर्व राजभाषा अधिकारी श्रीमती संगीता सेठी एवं अन्य निर्णायक के रूप में केन्द्रीय विद्यालय, बीकानेर से हिन्दी व्याख्‍याता डॉ.चन्द्रप्रकाश यादव को आमन्त्रित किया गया।
श्रीमती संगीता सेठी ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी विषय की प्रस्तुति महत्वपूर्ण होती है। हमें अपनी मातृभाषा का प्रयोग कर सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति देने का भरपूर प्रयास करना चाहिए क्योंकि हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान देश के प्रति स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है। 
इस अवसर पर डॉ.चन्द्र प्रकाश यादव ने कहा कि अभिव्यक्ति, व्यक्ति की संपूर्ण विचारधारा का बोध कराती है। जिस भाषा के पीछे हमारी पहचान छिपी होती है उसके प्रति सम्मान आवश्‍यक है।
केन्द्र निदेशक डॉ.नितीन वसन्तराव पाटिल ने अपने अध्यक्षीय उद्‌बोधन में कहा कि आशुभाषण प्रतियोगिता के आयोजन के पीछे मूल भावना सभी की भागादारी हों, यह समय की मांग भी है क्योंकि अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रत्येक कार्मिक केन्द्र के उत्तरोत्तर विकास में सहायक हो सकता है। मातृभाषा हिन्दी एवं केन्द्र का 'क'  क्षेत्र में स्थित होने के कारण हम सभी का यह दायित्व है कि राजभाषा के प्रगामी प्रयोग में अपना बहुमूल्य योगदान दें।
विजेता प्रतिभागी (प्रशासनिक एवं शेष तकनीकी वर्ग)
प्रथम        श्री अनिल कुमार
द्वितीय      श्री सतनाम सिंह
तृतीय      श्री हरपाल सिंह
प्रोत्साहन  श्री कंवर पाल शर्मा

विजेता प्रतिभागी (सहायक कर्मचारी वर्ग)

प्रथम        श्री नेताराम
द्वितीय       श्री दुर्गासिंह
तृतीय       श्री माणक लाल किराडू

(३) हिन्दी में श्रुति लेखन प्रतियोगिता (सभी वर्गों हेतु)

केन्द्र में हिन्दी सप्ताह, २०११ के अन्तर्गत दिनांक १७.०९.२०११ को श्रुति लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता को लेकर सभी वर्ग के कार्मिकों में उत्साह देखा गया और अच्छी संख्‍या में भाग लेकर राजभाषा के प्रगामी प्रयोग हेतु उपयुक्त वातावरण का सृजन करने में अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।

विजेता प्रतिभागी

प्रथम        :     श्री हरपाल सिंह
द्वितीय       :     डॉ.बलदेव दास किराडू
तृतीय       :     श्री सुखदेव प्रजापत
प्रोत्साहन    :     श्री राधाकृष्ण

(४) राजभाषा कार्यशाला

केन्द्र में हिन्दी सप्ताह, २०११ के अन्तर्गत दिनांक १९.०९.२०११ को राजभाषा कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला व्याख्‍यान से पूर्व, प्रभारी राजभाषा डॉ.बिहारी लाल चिरानियां द्वारा आयोजित कार्यशाला के उददेश्‍यों एवं महत्व पर प्रकाश डाला गया।
इस अवसर पर आयोजित राजभाषा कार्यशाला में मुख्‍य वक्ता के रूप में पधारीं राजकीय डूँगर महाविद्यालय, बीकानेर की डॉ.शालिनी मूलचंदानी, वरिष्ठ व्याख्‍याता, हिन्दी विभाग ने 'सहज एवं सरल हिन्दी' विषयक व्याख्‍यान पर बोलते हुए कहा कि हिन्दी हमारे चिंतन को व्यक्त करती है, यह हमारी संवेदनाओं को जगाती है। मनुष्य के चित्त की गहराई भाषा द्वारा ही ज्ञात की जा सकती है। हिन्दी के विकास में सबसे अधिक योगदान हिन्दीत्तर भाषियों ने प्रदान किया है। भारत के महान विद्वानों ने हिन्दी को अपना कर साहित्य की रचना की। डॉ.मूलचंदानी ने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक युग में हिन्दी की उपादेयता समाप्त नहीं हुई है। उन्होंने हिन्दी भाषा को एक जीवंत भाषा बताते हुए कहा कि अपनी संप्रेषणीयता के कारण ही हिन्दी स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बन पाई। डॉ.मूलचंदानी ने हिन्दी को क्लिष्ट भाषा न बनाते हुए इसके सरलीकरण पर जोर देने की बात कही। अतिथि वक्ता ने हिन्दी भाषा में रोजगार की प्रबल संभावनाओं को भी व्यक्त करते हुए कहा कि वैश्‍वीकरण के दौर में आज परिस्थितियाँ बदल गई है और समस्त टी.वी.चैनलों, सिनेमा एवं एफ.एम.रेडियो इत्यादि में आज यह भाषा एक आवश्‍यकता के रूप में ऊभर कर सामने आ रही है।

(५) हिन्दी सप्ताह, २०११ : पुरस्कार वितरण-समापन समारोह

केन्द्र में आयोजित हिन्दी सप्ताह का पुरस्कार वितरण-समापन समारोह दिनांक १९.०९.२०११ को सायं ३.०० बजे केन्द्र-सभागार में आयोजित किया गया। इस अवसर पर मुख्‍य अतिथि के रूप में डॉ.एस.के.शर्मा, निदेशक, केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर को आमंत्रित किया गया।
मुख्‍य अतिथि डॉ.शर्मा ने अपने अभिभाषण में कहा कि भारत देश को विश्‍व गुरू के रूप में देखा जाता रहा है। भारत विविधता का देश है जहां विभिन्न भाषाएं एक साथ विचरण करती है। राष्ट्र समृद्धि हेतु हमें हिन्दी भाषा अपनानी होंगी। हमें एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा।  डॉ.शर्मा ने कहा कि मातृभाषा में अभिव्यक्ति सभी के लिए सहज एवं सरल होती है। उन्होंने कहा कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, हमें केवल सोच बदलने की आवश्‍यकता है। अतः हिन्दी को पूरे मनोयोग से अपनाने की महत्ती आवश्‍यकता है। समापन समारोह के विशिष्ट अतिथि डॉ.एन.डी.यादव, अध्यक्ष, केन्द्रीय शुष्क अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय केन्द्र, बीकानेर ने अपने उद्‌बोधन में कहा कि हिन्दी को विज्ञान की भाषा में व्यक्त करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इस दिशा में सतत प्रयास जारी रहने चाहिए। हिन्दी में प्रत्येक भाषा के शब्द हैं अतः हमें हिन्दी में सोचते हुए इसे प्रयोग में लाना चाहिए। डॉ.यादव ने स्पष्ट किया कि आज से २०० साल बाद भी अध्यात्म विज्ञान की जानकारी हेतु हिन्दी की आवश्‍यकता होगी।
समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए केन्द्र निदेशक डॉ.नितीन वसन्तराव पाटिल ने अपने अभिभाषण में केन्द्र के विजेता प्रतिभागियों को बधाई दीं और राजभाषा के योगदान में सभी के सहयोग हेतु प्रोत्साहित करते हुए कहा कि जब हम हिन्दी को बोलचाल की भाषा के रूप में काम में लेते है तो उसे पूर्णतया कार्यरूप में लेने का भी प्रयास किया जाना चाहिए। अतः हम हिन्दी भाषी बनें, हिन्दी में सोचें, बोलें तथा लिखें भी। अध्यक्ष महोदय ने  हिन्दी भाषा को आज की महत्ती आवश्‍यकता बताते हुए कहा कि यदि हमें अनुसंधान का लाभ किसानों, ऊँट पालकों, ग्रामीणों एवं जरूरतमंदों तक पहुँचाना हैं तो प्रसार-प्रचार की भाषा के रूप में हिन्दी को अपनाना होगा तभी हमारे द्वारा निष्पादित कार्यों का सुफल प्राप्त होगा और हमारे अनुसंधान सार्थक होंगे।
इस अवसर पर प्रभारी राजभाषा डॉ.बिहारी लाल चिरानियां ने केन्द्र की राजभाषा के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों एवं गतिविधियों पर प्रकाश डाला। केन्द्र निदेशक एवं अतिथियों द्वारा विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए गए।
इस महत्वपूर्ण अवसर पर भा.कृ.अनु.प. का गीत (थीम सोंग) सुनाया गया तथा अतिथियों एवं केन्द्र कार्मिकों द्वारा केन्द्र के प्रक्षेत्र में वृक्षारोपण भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्री नेमीचन्द ने किया। धन्यवाद प्रस्ताव प्रभारी राजभाषा डॉ.बिहारी लाल चिरानियां ने प्रस्तुत किया। केन्द्र में हिन्दी सप्ताह, २०११ के दौरान आयोजित राजभाषा गतिविधियों संबंधी समाचार स्थानीय समाचार पत्रों द्वारा प्रकाशित किए गए।